Autoimmune Hepatitis kya hai? or kaise hota hai?
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस क्या है?
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस एक ऐसी गंभीर लेकिन दुर्लभ बीमारी है जिसमें शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) गलती से अपने ही लीवर (यकृत) की कोशिकाओं पर हमला करने लगती है। सामान्य स्थिति में इम्यून सिस्टम शरीर को बैक्टीरिया, वायरस और अन्य हानिकारक तत्वों से बचाता है, लेकिन इस बीमारी में यह सिस्टम भ्रमित हो जाता है और लीवर को दुश्मन समझकर नष्ट करने लगता है।
इसके परिणामस्वरूप लीवर में सूजन (Inflammation) हो जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में “हेपेटाइटिस” कहा जाता है। यदि समय पर इलाज न किया जाए, तो यह बीमारी धीरे-धीरे लीवर को नुकसान पहुँचाती है और अंततः लीवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) या लीवर फेलियर का कारण बन सकती है।
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन यह महिलाओं में पुरुषों की तुलना में अधिक देखा जाता है। यह बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों—तीनों में हो सकता है, हालांकि अधिकतर मामले 10 से 30 साल की उम्र के बीच पाए जाते हैं।
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस कैसे होता है?
इस बीमारी का मूल कारण इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी है। सामान्य स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर के “अपने” और “पराए” कोशिकाओं में अंतर कर पाती है। लेकिन ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस में यह क्षमता बिगड़ जाती है।
इम्यून सिस्टम लीवर की कोशिकाओं को विदेशी समझ लेता है और उन पर हमला शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया में:
लीवर की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होने लगती हैं
लीवर में सूजन बढ़ती जाती है
धीरे-धीरे स्वस्थ लीवर टिश्यू की जगह पर निशान (Scar Tissue) बनने लगता है
लंबे समय में यह स्थिति लीवर सिरोसिस में बदल सकती है
यह प्रक्रिया अचानक भी हो सकती है और धीरे-धीरे भी। कई लोगों में यह बीमारी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के वर्षों तक चलती रहती है।
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के कारण?
1. जेनेटिक (आनुवंशिक) कारण
कुछ लोगों में यह बीमारी परिवार से मिलने की संभावना अधिक होती है। यदि किसी के परिवार में अन्य ऑटोइम्यून बीमारियाँ (जैसे थायरॉइड, टाइप-1 डायबिटीज, रूमेटॉइड आर्थराइटिस) हैं, तो उनमें ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस का जोखिम बढ़ सकता है।
2. पर्यावरणीय कारक
कुछ वायरस या बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश करने के बाद इम्यून सिस्टम को ट्रिगर कर सकते हैं। इसके बाद इम्यून सिस्टम न केवल वायरस से लड़ता है, बल्कि गलती से लीवर पर भी हमला करने लगता है।
3. अन्य ऑटोइम्यून बीमारियाँ
जो लोग पहले से किसी ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित हैं, उनमें ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस होने का खतरा अधिक होता है।
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के लक्षण?
इस बीमारी के लक्षण व्यक्ति-व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ लोगों में हल्के लक्षण होते हैं, जबकि कुछ में बहुत गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं।
#प्रारंभिक लक्षण:
अत्यधिक थकान
कमजोरी
भूख न लगना
हल्का बुखार
पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द
उल्टी या मितली
#लीवर प्रभावित होने पर दिखने वाले लक्षण:
त्वचा और आँखों का पीला पड़ना (पीलिया)
पेशाब का रंग गहरा पीला होना
मल का रंग हल्का होना
त्वचा में खुजली
पेट में सूजन (Ascites)
#गंभीर अवस्था के लक्षण:
यदि बीमारी बढ़ जाती है और सिरोसिस हो जाता है, तो निम्न लक्षण दिख सकते हैं:
पैरों और पेट में पानी भरना
अत्यधिक कमजोरी
बार-बार खून बहना
भ्रम या मानसिक बदलाव (Hepatic Encephalopathy)
लीवर फेलियर
निदान?
डॉक्टर इस बीमारी का पता लगाने के लिए कई टेस्ट कर सकते हैं:
Liver Function Test (LFT)
Autoantibody Test (ANA, SMA, LKM-1)
IgG Level Test
Liver Biopsy (लीवर का छोटा सा टुकड़ा निकालकर जाँच)
निष्कर्ष
ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस एक गंभीर लेकिन उपचार योग्य बीमारी है, यदि समय पर पहचान कर ली जाए। इसके लक्षण अक्सर सामान्य थकान जैसे दिखते हैं, इसलिए लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक थकान, पीलिया या पेट दर्द बना रहे, तो तुरंत डॉक्टर से जाँच करवानी चाहिए। सही समय पर इलाज मिलने से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है और लीवर को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।