होम्योपैथी में सही दवा का चयन करना भी कलाहै और विज्ञान भी।
- यह मात्र बीमारी के नाम पर ही दवा देने की क्रिया नहीं है, पर मरीज के पूरा व्यक्तित्व, लक्षणों , व्यक्तिगत प्रकृति को समझ कर के दवा को चुनने की पद्धति है।
- यह कारण है कि, होम्योपैथी को individualized treatment system भी कहा जाता है।
२) होम्योपैथी में Remedy Selection का मूल सिद्धांत क्या है?
- होम्योपैथी का सिद्धांत है , Like cures like(समान समान को ही ठीक करता है)।
- इसका अर्थ है, जिस किसी स्वस्थ व्यक्ति में जो लक्षण होते हैं,वो वही पदार्थ उसी तरह के लक्षण वाले मरीज को ठीक कर सकता है।
- सही remedy को चुनने के लिए सिद्धांत पर्याप्त नहीं है। गहराई से केस को स्टडी करनी होती है।
#1. केस टेकिंग :: पहला चरण
- Exact remedy के चयन से केस टेकिंग होती है। इस में कुछ बात पर ध्यान दिया जाता है, जैसे की,
- लक्षणों के अवधि।
- लक्षणों के स्वरूप
- क्या - क्या चीज़ से लक्षण बढ़ते या घटते हैं.
- मरीज के मानसिक अवस्था
#2. मानसिक लक्षण का महत्व
- होम्योपैथी में मानसिक लक्षण को ज्यादा महत्व दिया जाता है।
- गुस्सा, डर, चिंता, भावनात्मक संवेदनशीलता
#3. शारीरिक लक्षण
- ठंड ,गर्मी के सहनशीलता।
- भूख , प्यास का स्तर।
#4. विशिष्ट लक्षण
- दर्द का स्थान , दर्द का प्रकार, समय (कब बढ़ता है – सुबह, रात).
#5. मॉडेलिटी
-
ठंड से आराम या गर्मी से. चलने से आराम या आराम करने से.
#6. हर व्यक्ति constitutional type होती है,
- पतला या मोटा शरीर, एक्टिव या सुस्त , मानसिक और शारीरिक प्रवृत्ति।
#7. 1. लक्षणों को रिपर्टरी में ढूंढा जाता है, संभावित रेमेडीज की सूची बनाई जाती है.
#8. कीनोट्स और रेयर लक्षण
- कुछ लक्षण ऐसे होते हैं, जो अलग बनाते हैं। जैसे की,
- अगर कोई दर्दी को ज्यादा ठंड से डरता है, तथा मीठा पसंद करता है. उसे रात में ज्यादा समस्या होती है
# 9. होम्योपैथी में एक समय पर टाइम पर एक ही दवा दी जाती है।
- कम डोज़ का सिद्धांत को अपनाया जाता है, बार-बार दवा देने से बचा जा सकता है
#10. फ़ॉलोअप तथा निगरानी
- सही दवा के बाद भी काम खत्म नहीं होता है, डॉ. को यह देखना भी होता है,
- दर्दी के लक्षणों में सुधार हो भी रहा है या नहीं।