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Diseases

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thakan kya hai or thakan kyu hota hai
1) थकान क्या है? थकान एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को लगातार थकान, कमजोरी या ऊर्जा की कमी महसूस होती है। यह केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और स्थिर स्तर पर भी हो सकता है। - कभी-कभी यह सामान्य लक्षण से होता है, जैसे अधिक काम करना, नींद पूरी न होना या तनाव। लेकिन अगर थकान लगातार बनी रहती है, तो यह कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या का लक्षण भी हो सकता है।  2) थकान के प्रकार कितने है? - शारीरिक थकान :  - शारीरिक थकान और कमजोरी।  - मानसिक थकान : – दिमाग का थका हुआ महसूस करना, ध्यान न लगाना।  - थकान थकान :  - तनाव, चिंता और अवसाद के कारण होने वाली थकान।  ३) थकान का सामान्य कारण? थकान  कारण  निचे बताये अनुसार हो सकता है, जैसे की ,  - नींद सही सें नही लेना ज्यादा काम या शारीरिक परिश्रम करना  - ज्यादा समय तक मानसिक चिंता  - आदर्श खान-पान और पोषण की कमी  - कैफीन और शराब या धूम्रपान का ज्यादा सेवन करना - बैठे-बैठे रहने की आदत #थकान से जुड़े रिश्ते कारण? कॉन्स्टेंसी थकान कुछ शर्तेँ का संकेत भी हो सकता है: - खून की कमी का  होना - थायरॉयड की समस्या - हृदय से रिलेटेड रोग  - क्रोनिक थकान सिंड्रोम - डिप्रेशन या चिंता जैसा विकार ३) थकान के लक्षण? - ऊर्जा और उत्साह  में कमी का हो जाना - कभी -कभी नींद सही से न आना  - सिरदर्द और चक्कर  का आते रहना -ध्यान को केन्द्रित करने में समस्या होना  - भूख में कमी हो जाना ४) थकान का उपचार और प्रबंधन? - कम से कम  ७ और ८ घंटे का नींद  लेना  - धीरे धीरे खाने को खायें  - नियमित कसरत करें - स्क्रीन टाइम कम करें  - तनाव नहीं लेना या सोचना नहीं चाहिए।  - योग करने से मन शांत होता है।  - रिलेक्सेशन तकनीक ५) थकान से मुक्ति? - प्रतिदिन अपने सही और निश्चित समय पर ही सोना और उठना होता है. - ज्यादा  देर तक काम करने पर और आराम भी करना जरुरी होता है.  - पानी को उचित मात्रा में पीना। 
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ulcerative colitis ka homeopathic me ilaaj
१)अल्सरेटिव कोलाइटिस क्यों होता है? अल्सरेटिव कोलाइटिस  यह तो लम्बे समय तक चलने वाली आंतों की बीमारी है, जो की, IBD के अंतर्गत आती है। - इस बीमारी में बड़ी आंत  और मलाशय की अंदरू की पर्त में लगातार सूजन और घाव बन जाते हैं। -  यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है, और दर्दी को बार-बार दस्त, खून का आना, पेट में तेज दर्द और कमजोरी जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। - यदि इसका समय पर इलाज न मिलने पर यह रोग जीवन के गुणवत्ता पर असर डाल सकता है। २) अल्सरेटिव कोलाइटिस होने के क्या कारण होते है? इसका अभी तक तो, कोई भी तरह का  सटीक कारण  नहीं पता है, पर शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे कई कारक हो सकते हैं: – शरीर की रोग - प्रतिरोधक प्रणाली गलती से अपनी ही आंतों के कोशिका पर हमला करती है। – यदि पारीवारिक  इतिहास है ,तो इसका जोखिम और भी बढ़  जाता है. – गलत खान-पान और तनाव,या चिंता  इस रोग को और भी बढ़ा सकते हैं। – कुछ बैक्टीरिया और वायरस के संक्रमण से भी इस बीमारी को ट्रिगर कर सकते हैं। ३) अल्सरेटिव कोलाइटिस के क्या लक्षण है?  इसके लक्षण अलग -अलग व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। शुरुआती अवस्था में यह हल्के हो सकते हैं, पर धीरे-धीरे बढ़ कर  के और भी गंभीर हो जाते हैं।- बार-बार  दस्त का आना - पेट में तेज  ऐंठन और तेज दर्द का होना - मलाशय में से भी खून का आना - थकान और कमजोरी जैसा लगना - वजन भी कम हो जाना - कभी -कभी तो भूख भी न लगना  ४) अल्सरेटिव कोलाइटिस के कितने प्रकार है?  सूजन आंत के किस भाग में है, इसके आधार पर इसे चार प्रकारों में बाँटा जाता है: - Ulcerative Proctitis – यह केवल मलाशय तक सीमित।  - Proctosigmoiditis – मलाशय और सिग्मॉइड कोलन प्रभावित।  - Left-sided Colitis – बाईं ओर की कोलन में सूजन। - Pancolitis – पूरी कोलन प्रभावित, सबसे गंभीर रूप। ५) जटिलताएँ ? यदि यह रोग लंबे समय तक अनियंत्रित रहे, तो कई जटिलताएँ हो सकती हैं: जैसे की।  - खून की कमी- कोलन का छिद्र  - बड़ी आंत का कैंसर  - जोड़ों, त्वचा और आँखों में सूजन  - बार-बार संक्रमण का होना #अल्सरेटिव कोलाइटिस का क्या निदान है? इस रोग की जाँच करने के लिए डॉक्टर कुछ जाँच करते हैं:  - कोलोनोस्कोपी : – आंतों की अंदरू की सतह को देखने के लिए। - बायोप्सी : – ऊतक का नमूना ले कर के सूजन की पुष्टि करना।  - रक्त परीक्षण : – एनीमिया और संक्रमण का पता करने के लिए। - स्टूल टेस्ट : – संक्रमण या खून की जाँच। - CT Scan / MRI – आंतों में हुई सूजन और जटिलताओं का पता लगाने के लिए। #बचाव और रोकथाम के क्या उपाय है? अल्सरेटिव कोलाइटिस को पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है, पर इन उपायों से लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है:  - संतुलित और पौष्टिक आहार का उपयोग करना ।  - धूम्रपान और शराब से  पूरी तरह से बचें। - पर्याप्त नींद लें और डेली कसरत करें। -नियमित रूप से डॉ. से परामर्श लेते रहें।
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urinary bladder cancer kya hai | urinary bladder ka homeopathy me ilaaj
१) मूत्राशय का कैंसर  क्या है? शरीर का वह भाग है जहाँ पेशाब अस्थायी रूप से संग्रहित होता है. और फिर बाद में मूत्रमार्ग के माध्यम से बाहर निकलता है। - जब मूत्राशय की परत की कोशिका असामान्य रूप से बढ़ने लग  जाती हैं ,और कैंसर का रूप ले लेती हैं, तो इस स्थिति को मूत्राशय का कैंसर कहा जाता है। - यह पुरुषों में  सबसे से ज्यादा पाया जाता है। यदि शुरुआती चरण में ही इसकी पहचान  की जाये तो, उपचार भी सफल रहता है। और दर्दी भी पूरी तरह से स्वस्थ जीवन जी सकता है। २) मूत्राशय कैंसर के कितने प्रकार है? मूत्राशय कैंसर कई तरह का होता है, जो की, कोशिका के आधार पर बांटा जाता है।- ट्रांजिशनल सेल कार्सिनोमा सबसे नार्मल प्रकार का  है। जो की ब्लैडर की अंदरूनी पर्त की कोशिका से उत्पन्न होता है। - स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा यह ज्यादा लम्बे समय तक मूत्राशय में संक्रमण या जलन होंने के कारण से होता है। धीरे-धीरे  से इसकी सामान्य कोशिका भी  कैंसर  में बदल जाती है.  - एडेनोकार्सिनोमा  यह बहुत ही दुर्लभ तरह का होता है। यह कैंसर उन ग्रंथियों से होता है, जो की सामान्य म्यूकस से बनाने का काम करती हैं।  ३) मूत्राशय कैंसर के कारण और जोखिम कारक? मूत्राशय कैंसर का अभी तक तो, सही तरह से कारण अभी पूरी तरह से पता नहीं  है, पर कुछ प्रमुख कारक  विकास में भूमिका निभाते हैं: - धूम्रपान सबसे बड़ा कारण माना गया है। जो की  तंबाकू में रहने वाले हानिकारक रसायन खून में मिलकर मूत्राशय तक जाते हैं और कोशिका को हानि करते है। - कुछ हानिकारक रसायनों के संपर्क में आने से भी यह  हो सकता है। जैसे की , पेंट करते समय , टेक्सटाइल और केमिकल इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों में इसका जोखिम सबसे ज्यादा होता है. - यह कैंसर ५० वर्ष से भी ज्यादा आयु के लोगों में पाया जाता है।जब की  पुरुषों में इसका खतरा अधिक है। ३) मूत्राशय कैंसर के क्या लक्षण होते है ?  शुरुआती दिनों में तो , हल्के लक्षण हो सकते हैं, पर जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, तब वो लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं। प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:  -पेशाब में से खून का आ जाना - बार-बार पेशाब करने की प्रॉब्लम । -पेशाब करते समय बहुत ही ज्यादा जलन या दर्द का होना।  - अचानक से पेशाब की तीव्र इच्छा का होना। अगर ऐसे लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत ही डॉ. से परामर्श करना जरूरी है। ४) मूत्राशय कैंसर का क्या निदान है? मूत्राशय कैंसर का पता करने के लिए कई तरह की डॉक्टर. जांचें करते है. मूत्र परीक्षण के माध्यम से रहे हुए मौजूद खून, संक्रमण कोशिका का पता लगाया जा सके।  - सिस्टोस्कोपी के जरिये से मूत्राशय के अंदर देखा जाता है।  -  मूत्राशय की पर्त से ऊतक लेकर जांच की जाती है।- अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे का उपयोग करके मूत्राशय और उसके आसपास के अंगों की स्थिति की  जानकारी प्राप्त करने के लिए किया जाता है। ५) मूत्राशय कैंसर का क्या उपचार है? मूत्राशय कैंसर का उपचार कई प्रकार से किया जा सकता है। यह कैंसर के  स्टेज और मरीज की  स्थिति के ऊपर निर्भर करता है। -सर्जरी (Surgery) शुरुआती स्टेज में ट्यूमर को बाहर निकालने के लिए प्रक्रिया होती  है, जिसे (TURBT) भी कहा जाता है।  - कीमोथेरपी कैंसर की कोशिका को खत्म करने के लिए दवाएँ दी जाती हैं। कभी-कभी तो सर्जरी के पहले या बाद में दी जाती है। - रेडिएशन थैरेपी तेज़ ऊर्जा वाले किरणों  से  कैंसर की कोशिकाओं को खतम किया जाता है। - इम्यूनोथैरेपी यह तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को एक्टिव करके कैंसर से लड़ने में मदद करते है। #इसके रोकथाम क्या है? मूत्राशय कैंसर को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता है , पर जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है: जैसे की,  - धूम्रपान और तंबाकू के उत्पादों से दूर रहें।  - अधिक मात्रा में पानी पिएँ, ताकि हानिकारक पदार्थ मूत्र के जरिये से  बाहर निकल जाएँ। - रसायनों के संपर्क से बचें।    - नियमित स्वास्थ्य की जांच कराते रहें, अगर पारिवारिक इतिहास है, तो,
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navjaat piliya kya hai
१) नवजात पीलिया क्या है? नवजात बच्चो में पीलिया का होना सामान्य है। इस में बच्चे की स्किन और आँखों का भाग भी पिले रंग जैसा दिखाई देने लगता है। यह तब होता है, जब की खून में बिलीरुबिन नामक पदार्थ की मात्रा ज्यादा हो जाती है।  - जो शरीर में पुराने लाल रक्त कोशिका के टूट जाने से बनता है। यह लिवर के माध्यम से भी साफ हो जाता है, पर नवजात शिशुओं में लिवर पूरी तरह से विकसित नहीं होने से पदार्थ शरीर में ही जमा होने लग जाते है.  २) नवजात पीलिया के कितने प्रकार है? *१) सामान्य पीलिया - अधिकांश बच्चो में जन्म के २ दिन के बाद ही हल्का पीलिया हो सकता है।  - यह अपने आप से ही १ सफ्ताह में ठीक हो जाता है ,और इसे सामान्य माना जाता है। *२) गंभीर पीलिया - बिलीरुबिन का लेवल बहुत तेजी से बढ़ने लग जाता है। और सही समय पर इलाज न मिले तो दिमाग कोभी हानि कर सकता है। ३) नवजात पीलिया होने के क्या कारण हो सकते है? नवजात पीलिया होने के कारण निचे अनुसार है ,जैसे की, - लाल रक्त की कोशिका का ज्यादा मात्रा में टूटने से पीलिया होने की संभावना ज्यादा हो सकती है।  - माता और बच्चे का ब्लड ग्रुप सही से नहीं मिलना -कुछ संक्रमण के कारण से भी बिलीरुबिन का लेवल बढ़ सकता है।  ४) नवजात पीलिया के क्या लक्षण है? - त्वचा का रंग पीला पड़ जाना और चेहरे से शुरू हो कर पैरों तक फैलना।  - आँखों का सफेद भाग भी पीला जैसा दिखना - बच्चों को बार-बार नींद का आना।  - दूध पीने से बार-बार उल्टी कर दें । - बहुत गंभीर मामलों में तो बच्चा चिड़चिड़ा हो जा सकता है, और उनकी  हाथ-पाँव अकड़ सकते हैं। ५) पीलिया का क्या निदान? डॉ. पीलिया की पहचान करने के लिए कुछ शारीरिक जाँच करते हैं: - बच्चे की स्किन और उनके आँखों का निरीक्षण। - रक्त में बिलीरुबिन का लेवल को मापा जाता है। #उपचार ? नवजात पीलिया का इलाज गंभीरता पर निर्भर करता है। जैसे की ,  - डेली स्तनपान जारी रखने से।  - बच्चे को नीली रोशनी के नीचे रखते है , जिस से की बिलीरुबिन टूट कर शरीर से बाहर निकल जाये।  - डॉक्टर के अनुसार IVफ्लूडस को दिया जा सकता है। #क्या जटिलताएँ होती है ? अगर पीलिया का इलाज सही समय पर नही हो, तो गंभीर हो सकता है और बच्चे के मस्तिष्क को भी हानि हो सकती है. - कभी -कभी तो सुनने में परेशानी का होना - बच्चो के विकास में भी देरी का होना
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neuropathic dard kya hota hai | homeopathy me neuropathic dard ka ilaaj
१) न्यूरोपैथिक दर्द क्या होता है? न्यूरोपैथिक दर्द यह लम्बी समय तक रही ऐसी स्थिति है, जो तब होती है ,जब हमारी तंत्रिकाएँ किसी चोट लगने से या तो कोई तरह का  दबाव की वजह से हानि हो जाती हैं। - ये तंत्रिका हमारे शरीर का तापमान और दर्द जैसी संवेदना मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करती हैं। - शरीर में जब भी दर्द का असामान्य  होना भी हो सकता है.  - नार्मल दर्द किसी भी तरह की चोट या सूजन का संकेत देता है, जबकि न्यूरोपैथिक दर्द  बिना चोट किसी स्पष्ट के भी हो सकता है.  २) न्यूरोपैथिक दर्द के लक्षण क्या है? न्यूरोपैथिक दर्द के लक्षण निचे बताये अनुसार हो सकते है, जैसे की, - कभी - कभी तो सुनापन जैसा भी हो जाता है, पर  हम को पता भी नहीं चलता है. - सामान्य चीज़ों पर दर्द (Allodynia): हल्के हाथों से स्पर्श करना ,और मौसम के परिवर्तन से भी यह दर्द हो सकता है। - इस तरह के कई लक्षण कभी - कभी देखने को मिलते है, तो कभी रुक-रुककर दर्द आते हैं, जिस से की हमारे डेली के जीवन को असर हो सकता है. ३) न्यूरोपैथिक दर्द के मुख्य कारण क्या हो सकते है? न्यूरोपैथिक दर्द के मुख्य कारण निचे अनुसार है, जैसे की, - मधुमेह : ज्यादा लम्बे समय तक हाई ब्लड शुगर रहने पर भी नसों को हानि पहुँच सकता है। -किसी भी तरह का एक्सीडेंट, या हड्डी-मांसपेशियों के दबाव पर से भी  इस पर असर  होता है.  - न्यूरोलॉजिकल रोग में मल्टीपल स्क्लेरोसिस और अन्य तंत्रिका संबंधी के बीमारियाँ भी हो सकती है. ४) न्यूरोपैथिक दर्द का प्रभाव कहा पर होता है? इसका दर्द केवल शरीर पर ही नहीं, हमारे मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी असर कर सकता है, जैसे की , - शारीरिक असर :  पुरे  शरीर में दर्द का होना , थकान और चलने-फिरने में भी बहुत ही परेशानी हो सकती है. - चिंता, डर और अवसाद जैसा भी हो सकता है. - असुविधा की वजह से भी  रात  में  नींद  पूरी  तरह से नहीं हो पाती है.  - दैनिक जीवन में काम करने में भी दिक्कतें हो सकती है. ५) न्यूरोपैथिक दर्द का निदान? डॉ. आपकी मेडिकल हिस्ट्री और लक्षणों के आधार पर ही कुछ जाँच करने को कहते है। - रक्त के परीक्षण  - इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG):  के माध्यम से भी मांसपेशियों और नसों की गतिविधि की जाँच करने से यह पता लगता है, की तंत्रिका क्षति कहाँ है, और दर्द का कारण क्या है.  #उपचार और प्रबंधन न्यूरोपैथिक के दर्द को पूरी तरह से  खत्म करना संभव नहीं है, पर लक्षणों को कम करके जीवन की गुणवत्ता में सुधार भी कर सकते है। १ . फिजिकल थेरेपी : शरीर की ताकत और लचीलापन बढ़ाने वाले व्यायाम।  २. कुछ गंभीर मामलों में इंजेक्शन भी दिया जाता है ,जिससे की आराम मिल सकता है. ३.मधुमेह और मोटापा पर कण्ट्रोल रखना  ४) डेली संतुलित आहार और  नियमित कसरत करना  ५) किसी भी तरह का तनाव और सोचना नहीं चाहिए.
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acid reflux treatment in homeopathy
१ )एसिड रिफ्लक्स क्या है? आज के समय की तेज़ रफ्तार जिंदगी में अनियमित खान-पान और चिंताजनक दिनचर्या के चलते पेट से जुड़ी हुयी कई तरह की समस्याएं का होना एक आम हो गया  हैं। और इन्हीं में से एक ,एसिड रिफ्लक्स है,जो कि परेशान करने वाली समस्या है। -यह तब होता है , जब हमारे पेट में बनने वाला अम्ल भोजन नली में से ईसोफेगस में वापस आने लग जाता है, जिससे की सीने में जलन का होना , खट्टी डकार का आना और गले में जलन जैसा लगता है.इसे ही एसिड रिफ्लक्स कहते हैं।  २) एसिड रिफ्लक्स के क्या लक्षण हो सकते है? - सीने में जलन होना। यह तो आम लक्षण है, जो की खाने के बाद रात में सोते समय अधिक महसूस होता है। - गले में जलन का होना या मुँह में से खट्टी डकारें का आना  - मुंह का स्वाद भी कड़वा जैसा होना - खांसी का आना - मुंह में से गंदी दुर्गंध का आना - कभी -कभी तो छाती में दर्द का होना और सांस लेने में भी परेशानी हो सकता है.  ३) एसिड रिफ्लक्स के क्या कारण है? एसिड रिफ्लक्स के कारण निचे अनुसार हो सकते है, जैसे की,  - ज़्यादा तली-भुनी या मसालेदार चीजें को खाने से।  - ज्यादा चाय और कॉफी का सेवन  - खाना खाने के तुरंत ही बाद में लेटना या झुकना  - धूम्रपान और शराब के कारण से - ज्यादा मोटापा का हो जाना - तनाव और नींद की कमी हो जाने से ३) जोखिम किन्हें ज़्यादा होता है? - गर्भवती महिलाओं में हार्मोनल के असंतुलन और बदलाव पेट पर दबाव के कारण।  - मोटे हुए लोगों को पेट की चर्बी बढ़ने के कारण।  - बहुत ही ज्यादा मात्रा में जंकफूड का उपयोग करने से  ४) उपचार और घरेलू उपाय? - सौंफ और मिश्री ,धनिया का काढ़ा पिने से एसिड को कम करने में आराम मिलता है। - हल्के गर्म पानी और भोजन के बाद थोड़ी देर टहलना।  - एलोवेरा का जूस, नारियल पानी और छाछ भी एसिडिटी को कम करने में सहायक हैं।  - कम चाय पिने से भी गैस और एसिड को शांत करता है।  * ध्यान दें * :: लगातार समस्या होने पर डॉ. से परामर्श अवश्य लें, क्योंकि ज्यादा लंबे समय तक एसिड रिफ्लक्स का रूप ले सकता है. ५) बचाव के उपाय? - छोटे-छोटे भागो में दिन में ३-४ बार भोजन का सेवन करें।  - खाना खाने के बाद में तुरंत नहीं सोना चाहिए. - सिर को ऊँचा करके सोएं। - मसालेदार खाना और तैलीय भोजन से दुरी रखे। - धूम्रपान और शराब को हमेशा के लिए त्याग दे.
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black hairy tongue treatment in homeopathy
१) ब्लैक हेरी टंग का इलाज क्या है? यह ऐसी स्थिति है, जिसमें जीभ की सतह पर मौजूद छोटे-छोटे पैपिला सामान्य से भी ज्यादा लंबे हो जाते हैं। उस पर बैक्टीरिया, फंगस , खाने-पीने वाले के कण जमा हो कर जीभ को भी काला जैसी दिखाई देने वाली बनावट दे देते हैं। - यह रोग गंभीर नहीं होता है,और सही देखभाल से भी ठीक हो सकता है। २) ब्लैक हेरी टंग होने के क्या कारण है? - 1.मुँह की साफ-सफाई सही से नहीं किया हो तो.  - 2. धूम्रपान ,तंबाकू के सेवन से भी रसायन जमने लग जाते हैं। - 3. मुँह में रहे हुए भी सामान्य बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है। - 4. अगर कम पानी पिने से और मुँह का सूखापन से भी बैक्टीरिया जीभ पर जमा हो जाती हैं।  #ब्लैक हेरी टंग के क्या लक्षण होते है? ब्लैक हेरी टंग के लक्षण निचे बताये अनुसार हो सकते है. जैसे की,  - जीभ के सतह पर काले कलर या पीले रंग की परत जमने लगती है.  - जीभ के पर्त पर खुरदरी बाल जैसा दिखाई देना। - मुँह में से बदबू का आना  - मुँह का स्वाद भी नहीं आना  #ब्लैक हेरी टंग का इलाज? #1.मुँह की सही सफाई -डेली में दिन और रात में अच्छे से टूथपेस्ट से ब्रश करना - जीभ की सतह पर धीरे-धीरे साफ करें। #2. धूम्रपान और तंबाकू को हमेंशा के लिए दुरी बनाये रखना। #3. सही आहार लें. - ज्यादा से ज्यादा पानी को पिएँ जिस से की मुँह सूखने न पाए।  - हमेंशा ताज़ा फल और सब्जियाँ को खाएँ, - चाय और अल्कोहल को कम करना  #4.दवाइयों की समीक्षा  * यदि समस्या एंटीबायोटिक या अन्य दवाइयों से हो रही है तो डॉक्टर से सलाह लेकर वैकल्पिक दवाइयों का प्रयोग करें।  #5.डॉक्टर द्वारा सुझाए गए उपचार * यदि समस्या गंभीर हो तो डॉक्टर जीभ के पैपिला को ट्रिम करने की सलाह दे सकते हैं।  * एंटीफंगल या एंटीबैक्टीरियल दवाइयाँ दी जा सकती हैं। * कभी-कभी लेज़र थेरेपी या विशेष उपकरण से पैपिला हटाए जाते हैं। # घरेलू नुस्खे 1. हल्के नमक पानी से गरारे करने से भी बैक्टीरिया को कम करता है। 2. हल्के से बेकिंग सोडा पेस्ट से जीभ की सतह पर रगड़ें। 3.नींबू का उपयोग करने से भी जीभ को साफ और ताजा रखने में मदद मिलता है। 4. एलोवेरा के जूस पिने से भी इसमें एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जिस से जीभ की सतह कम होती है।#ब्लैक हेरी टंग होने पर कब डॉक्टर से मिलें? - यदि ऐसे समस्या ज्यादा समय से तक रहे तो।  -जीभ पर दर्द और सूजन या खून आने लगे। - यदि दवा के बदलने पर भी सुधार नहीं हो रहा है तो. । * यदि मुँह से गंदी बदबू आ आना ५)ब्लैक हेरी टंग के बचाव के उपाय? - डेली २ टाइम ब्रश और टंग को साफ़ करना।  - धूम्रपान और तंबाकू को पूरी तरह से छोड़ दें। - उचित मात्रा में पानी को पिएँ। - नियमित रूप से डेंटिस्ट से चेकअप कराएँ।
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sardi jukam ka homeopathic ilaj
१) कॉमन कोल्ड ? कॉमन कोल्ड, जिसे सामान्य जुकाम के नाम से भी जाना जाता है. हल्का वायरल संक्रमण है। जो की, मुख्य रूप से ऊपरी श्वसन तंत्र को असर करता है। - इसमें नाक, गला, और स्वरयंत्र जैसे अंगों में सूजन, जलन और संक्रमण के लक्षण देखने को मिलते हैं। - यह गंभीर बीमारी नहीं है, लेकिन व्यक्ति को कुछ दिनों तक परेशानी का सामना करना पड़ता है. २) कॉमन कोल्ड के प्रमुख कारण क्या है? -जुकाम का कारण अलग-अलग प्रकार के वायरस से हो सकते हैं, पर सबसे आम वायरस राइनोवायरस होता है।  - यह संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने, और हाथ मिलाने से फैलता है.  # फैलने के अन्य सामान्य कारण? - संक्रमित रहे हुए व्यक्ति के संपर्क में आने से. - भीड़- भाड़ वाली जगहों में रहनएक साथ में घूमने से।  - हाथों को बिना साबुन से धोए ही आंख या नाक को छूना - मौसम में बदलव से.  - कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली से भी ३) कॉमन कोल्ड के लक्षण क्या है? इसके लक्षण आमतौर 1 से 3 दिन बाद से ही शुरू होते हैं ,और लगभग कुछ दिनों तक रह सकते हैं।  - नाक का बहना या बंद होना  - गले में खराश जैसा लगना  - हल्का सा बुखार - सिर में तेज दर्द का होना  - छींक का बार बार आना  - आंखों में जलन और पानी का आना ४ )इलाज ? कोई विशेष इलाज नहीं है, क्योंकि यह वायरल संक्रमण है, और कुछ समय में खुद ही ठीक हो जाता है। - गर्म पेय पदार्थों को लें – जैसे की , तुलसी वाली चाय का सेवन  - नाक को खोलने के लिए पानी के भाप लेना - नाक की अच्छी से सफाई रखें - दर्द या बुखार लगने पर पैरासिटामोल का उपयोग करना। - गले की खराश के लिए पिए गर्म पानी को पीना। - खूब मात्रा में पानी को पीना ५) क्या डॉक्टर के पास जाना ज़रूरी है? सामान्य जुकाम में डॉक्टर की ज़रूरत नहीं पड़ती है , पर कुछ दिन से भी अधिक हो जाये तो डॉ. से मिलना। - खांसी ४-५ दिनों से भी ज्यादा रहे  - सांस लेने में परेशानी - सीने में दर्द का होना - कानों में से द्रव का निकलना #बचाव कैसे करें? - अपने हाथों को बार-बार साबुन से अच्छे से धोएं  - भीड़ भाड़ वाली जगहों पर नहीं जाना।  - अपने मुंह और नाक को रुमाल से साफ़ करे।  -बीमार व्यक्ति से दूर रहना
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fistula treatment in homeopathic
१) फिस्टुला क्या बीमारी है? फिस्टुला शरीर में बनने वाली एक असामान्य नली (ट्यूब जैसी संरचना) होती है, जो दो अंगों को आपस में जोड़ सकती है या किसी अंग को त्वचा से जोड़ देती है। - सामान्य परिस्थितियों में यह मार्ग मौजूद नहीं होता। - यह ज्यादातर किसी संक्रमण, चोट, लंबे समय तक बनी सूजन या ऑपरेशन के बाद बनता है। - फिस्टुला होने पर शरीर के अंदर का मवाद, मल, मूत्र या अन्य तरल पदार्थ बाहर निकलने लगते हैं। २) फिस्टुला बनने के कारण क्या है? फिस्टुला बनने की कई वजह हो सकती हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं: - 1. शरीर के किसी भी भाग का घाव ठीक से नहीं भरता है ,और उसमें लगातार संक्रमण बना रहता है, तो वह बाहर निकलने का रास्ता बना लेता है।  - 2. यह सबसे आम प्रकार है। यह गुदा ग्रंथियों में संक्रमण के कारण होता है और मलद्वार के पास एक नली जैसा मार्ग बना देता है।  - 3. यह एक लम्बे समय की आंतों की बीमारी है। जो की , लंबे समय तक सूजन रहने से आंतों के बीच या आंत और त्वचा के बीच फिस्टुला बनने लगता है। - 4. किसी सर्जरी के बाद भी घाव सही तरह से नहीं भरता है , और वहां इंफेक्शन हो जाता है, तो फिस्टुला बनने की संभावना रहती है। ३) फिस्टुला होने के क्या लक्षण है? - फिस्टुला की पहचान उसके प्रकार और स्थान पर निर्भर करती है। सामान्य रूप से पाए जाने वाले लक्षण इस प्रकार हैं:  - लगातार **मवाद या खून का रिसाव**  - एक ही स्थान पर बार-बार **फोड़े बनना और फटना जाना ** - प्रभावित हिस्से में **दर्द, सूजन और जलन** - मल या मूत्र पास करते समय समस्या या असुविधा ३) फिस्टुला से बचाव? फिस्टुला को रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ सावधानियाँ अपनाकर इसके जोखिम को कम कर सकते है जैसे की , - हमेशा **स्वच्छता** पर ध्यान देना सही है।  - कब्ज से बचें।  - किसी भी **संक्रमण का सही इलाज** कराएं।  - यदि आपको क्रोहन रोग बीमारी** है तो नियमित डॉक्टर की सलाह का पालन करें।    # निष्कर्ष   फिस्टुला एक गंभीर लेकिन उपचार योग्य स्थिति है। इसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि बार-बार होने वाले संक्रमण से समस्या बढ़ सकती है। अगर इसके लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं और सही इलाज लें। समय पर ध्यान देने से फिस्टुला पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
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melanoma kya hai
१) मेलेनोमा का इलाज क्या है? मेलेनोमा ये स्किन कैंसर का गंभीर रूप है, जो की, मेलानोसाइट्स नामक कोशिका से होता है। - ये कोशिका स्किन पर पिगमेंट बनाती हैं। जब इनमें असामान्य वृद्धि और DNA को हानि होती है, तो मेलानोमा होता है। - यह कैंसर शरीर के कोई भी भागों में फैल सकता है, इसलिए समय पर निदान ज़रूरी है। २) मेलानोमा के कारण और जोखिम क्या है? - 1 सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरण ये हमारे त्वचा को हानि कर सकती है. - 2. कृत्रिम UV किरणें भी कारण बनती है  - 3.परिवार में पारिवारिक इतिहास से भी हो सकता है. -4 बड़े, और असमान दिखने वाले तिल से भी मेलानोमा हो सकता है। ३) मेलानोमा के लक्षण क्या है ? मेलानोमा के लक्षण निचे बताये अनुसार हो सकता है. , जैसे की, – तिल के आकार का असमान होना।  - रंग जो की ,असमान, काला, भूरा, जैसा लगना  - तिल का साइज 6 mm से भी बड़ा होना।  - अन्य लक्षणों में खुजली, और खून आना हो सकते हैं। ४) मेलानोमा का इलाज बताये? *इम्यूनोथेरेपी* : शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जो की, कैंसर से लड़ने के लिए होते है. *कीमोथेरेपी* यह मेलानोमा का मुख्य इलाज था, पर अब नई थेरेपी के आ जाने से इसका प्रयोग कम हो गया है।कुछ समय के लिए कण्ट्रोल कर सकते है.  * रेडियोथेरेपी* जब सर्जरी न हो तो इसका उपयोग किया जाता है।५) जीवनशैली और सहायक उपचार क्या है? *धूप से बचाव करना जरुरी है.  * अगर काम हो तो सनस्क्रीन का उपयोग करना  * फल और हरी सब्ज़ियाँ जो की एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर * डेली कसरत करना जिस से की चिंता कम हो. #बचाव के उपाय? - स्किन पर नया तिल या पुराने तिल में परिवर्तन होने से तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।  - एक बार **स्किन का चेकअप** करना  -UV किरणों से बचाव के लिए टोपी , और मुँह पर रुमाल लगाना  * बच्चों को ज्यादा धूप से बचाना ज़रूरी है, क्योंकि आगे चलकर मेलानोमा में बदल सकता है।
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HFMD ka homeopathy me ilaaj
#हैंड, फुट एंड माउथ डिज़ीज़ का इलाज HFMD वायरल संक्रमण है जो ,की छोटे बच्चों में देखा जाता है। यह *कॉक्ससाकी वायरस के कारण से होता है। - इसमें हाथ, और पैर , मुँह के अंदर भी छोटे-छोटे लाल चकत्ते दिखाई देते हैं। यह रोग संक्रामक होता है. और एक बच्चे से दूसरे बच्चे में सरलता से भी फैल सकता है। २) HFMD के क्या लक्षण है? HFMD के लक्षण निचे बताये अनुसार हो सकते है,जैसे की,  - 1. बुखार और गले में खराश जैसा लगना - 2. भूख में कमी हो जाना।- 3. मुँह में छाले का हो जाना - 4. हाथ-पैर में भी लाल दाने का दिखाई देना  - 5. शरीर में बार-बार थकान और कमजोरी के जैसा लगना ।  ३) HFMD बीमारी का फैलाव? * संक्रमित हुए बच्चे की खाँसी या छींक से।  * बच्चे के मुँह में डाले हुए खिलौने,या बर्तन का उपयोग करने से। * संक्रमित हुए बच्चे से भी दूसरे बच्चे को भी संक्रमित कर सकता है.  #इसका क्या इलाज है? 1. बुखार और दर्द का इलाज - डॉक्टर की सलाह से ही पैरासिटामोल दवा को दें। जिस से की बुखार और दर्द कम हो जाता है.  - 2. मुँह के छालों का इलाज  * गुनगुना पानी को ही पीना सही होता है।  * ठंडे तरल पदार्थ जैसे की , दूध, नारियल का पानी, जूस को देना सही है। * मसालेदार और खट्टे पदार्थ का उपयोग नहीं करना  - 3. बच्चे को पानी, और नारियल का पानी पिने से बहुत ही लाभ होता है। * पानी की कमी हो जाने भी ये बीमारी हो सकती है. - 4. बच्चे को सही तरह से आराम करने दें। और पौष्टिक आहार दें। ४) घरेलू देखभाल? 1. बड़े बच्चों के लिए गुनगुने पानी से गरारे करना सही हो सकता है।  2. ठंडी चीज़ें को खिलाना जैसे आइसक्रीम , दही।  3. हल्के गर्म पानी से स्नान से खुजली और जलन भी बहुत ही कम होती है। 4. साफ-सफाई का ज्यादा ध्यान रखें।  ५) HFMD के लिए क्या सावधानियाँ कर सकते है? * संक्रमित हुए बच्चे को स्कूल नहीं जाने देना चाहिए।  * बच्चे को हाथ धोने की आदत डालें।  * परिवार के मेंबर को भी अन्य बच्चों से दूर रखना सही है.  ५) HFMD कब डॉक्टर से मिलें? * बच्चा बिल्कुल भी खाना-पीना नहीं कर रहा है ,तो। * तेज बुखार का बार - बार आना। * त्वचा पर घाव बहुत ही ज्यादा बढ़ जाएँ।
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low blood pressure treatment in homeopathy
१) हाइपोटेंशन क्या है? मानव शरीर के सब अंग सही तरीके से काम करने के लिए सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों जरुरी होता है. जो की खून के माध्यम से उन तक पहुँचते हैं। - खून का प्रवाह तब ही सही तरीके से होता है, जब की हमारे शरीर में रक्तचाप संतुलित हो। - जब रक्तचाप बहुत ही कम हो जाता है, तो शरीर के अंगों को सही मात्रा में रक्त नहीं मिल पाता है, जिस से की कई समस्याएं हो सकती हैं। इस स्थिति को हाइपोटेंशन कहते है. २) हाइपोटेंशन के कितने प्रकार के होते है? यह ४ तरह का होता है, - (१) Orthostatic Hypotension : कोई भी व्यक्ति लेटे हुये या बैठे अवस्था से खड़ा होता है,तब ब्लड प्रेशर कम हो जाता है. - (२) Postprandial Hypotension : भोजन करने के बाद भी ब्लड प्रेशर में कमी का देखा जा सकता है. - (३) Neurally Mediated Hypotension : ज्यादा समय तक खड़े रहने से भी या तनाव के कारण से भी ब्लड प्रेशर कम हो सकता है. - (४) Severe Hypotension : यह एक आपातकालीन स्थिति होती है जिसमें शरीर के अंगों को पर्याप्त रक्त नहीं मिल पाता। ३) हाइपोटेंशन के क्या संभावित कारण हो सकते है? - शरीर में पानी की मात्रा में कमी होने पर ही रक्त की मात्रा भी घट जाती है, जिस से की ब्लड प्रेशर कम होता है. - प्रेग्नेंसी के दौरान भी शरीर में रक्त प्रवाह में परिवर्तन होता है, जिस से की रक्तचाप कम हो सकता है। - एंडोक्राइन जैसे समस्याएं से भी थायरॉयड की गड़बड़ी, एड्रिनल ग्रंथि की समस्या, लो ब्लड शुगर।  - लाल रक्त कोशिका की कमी होने से भी ऑक्सीजन सप्लाई कम हो जाती है। - गंभीर संक्रमण से शरीर में सूजन और रक्त प्रवाह को काफी हद तक असर कर सकता है।  - एलर्जी रिएक्शन से भी रक्तचाप को तेजी से गिरा सकती है। ४) हाइपोटेंशन के लक्षण क्या है? - चक्कर का आते रहना और बेहोशी जैसा होना  - थकान और कमजोरी जैसा लगना  - आँखो से सही दिखाई न देना - ध्यान को केंद्रित करने में परेशानी का होना  - मतली या उल्टी  ५) हाइपोटेंशन का निदान कैसे किया जाता है? डॉक्टर आपके लक्षणों, और शारीरिक जांच के आधार पर ही निम्नलिखित जांच कर सकते हैं: - ब्लड प्रेशर को मापन : बैठने और लेटने या ज्यादा समय तक खड़े होने की स्थिति में चेक किया जाता है।  - ECG : दिल की कार्य क्षमता का पता करने के लिए।  - ब्लड टेस्ट : हार्मोन का असंतुलन होना या संक्रमण का पता करने के लिए। #हाइपोटेंशन का इलाज इलाज पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि इसका कारण क्या है और लक्षण कितने गंभीर हैं:  (1) जीवनशैली में परिवर्तन करने से - पर्याप्त मात्रा में पानी को पीना सही हो सकता है. - डॉक्टर के सलाह से भोजन में नमक की मात्रा को कम या बताये अनुसार ही लेना।  - हल्का भोजन ही करें। (2 ). आपातकालीन की स्थिति में - अगर पेशेंट बेहोश हो जाये तो IV Fluids भी देते है।  - सांस लेने में कोई तरह की परेशानी हो तो ऑक्सीजन का सपोर्ट। #हाइपोटेंशन से बचाव के उपाय? - ज्यादा मात्रा में पानी को पीना सही होता है.  - ज्यादा गर्मी से बचें।  - लम्बे समय तक खड़े नहीं रहना।  - डॉक्टर के अनुसार ही दवाओं का सेवन करें। - ब्लड प्रेशर को डेली समय पर चेक करना सही होता है.
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naak se khoon aana ka homeopathy me ilaaj
#नाक से खून निकलना (Epistaxis) – कारण, लक्षण और उपचार नाक से खून का आना आम समस्या है,जिसे मेडिकल भाषा में **एपिस्टेक्सिस (Epistaxis)** कहते है। यह समस्या अचानक से होती है, और कई बार पेशेंट और उसके परिवार को चिंता में डाल देती है। -ज्यादातर मामलों में यह गंभीर नहीं होती है, पर थोड़ी सी सावधानी से रोकी जा सकती है.  #नाक से खून निकलने के प्रमुख कारण क्या है? नाक की अंदर की सतह पर पतली और संवेदनशील रक्त वाहिकाएँ होती हैं। जब किसी कारणवश से फट जाती हैं, तो खून बहने लगता है। मुख्य कारण निम्न हो सकते हैं:  1.*पर्यावरणीय कारण* - बहुत ही ज्यादा गर्मी से - बहुत ठंडी हवा  -धूल, धुआँ और प्रदूषण  2. *आघात (Trauma)* - नाक पर चोट लग जाने से   - नाक कुरेदना  - किसी प्रकार का आंतरिक घाव लग जाने से।  3. *बीमारियाँ और शारीरिक स्थितियाँ* - हाई ब्लड प्रेशर जैसा होना  - साइनस का इंफेक्शन - बार-बार सर्दी होंसे से नाक में से खून का आना  4.*अन्य कारण* - दवाओं का साइड इफ़ेक्ट का होना - विटामिन C और विटामिन  K की कमी होने से - शराब और धूम्रपान के सेवन से भी हो सकता है। #नाक से खून बहने के क्या लक्षण है? - अचानक से दोनों नाक से खून का नीकल जाना।  -खून बहने के साथ में चक्कर का आना , कमजोरी जैसा और , बेचैनी जैसा महसूस होना #नाक से खून रुकवाने के क्या उपाय? 1.*रोगी को सीधा बैठाएँ*  - पीठ को हमेशा सीधी रखें और सिर थोड़ा आगे की ओर झुकाएँ।  - सिर पीछे झुकाने से खून गले में चला जाता है, जिससे घुटन या उल्टी हो सकती है। 2 . *ठंडी सिकाई करें* - नाक और सिर पर ठंडे पानी का कपड़ा रखें। - ठंड से रक्त वाहिका सिकुड़ती हैं, जिस से की खून रुकने में मदद मिलती है। 3. *आराम करें* - खून रुक जाने के बाद कुछ देर तक आराम करे। - जोर- जोर से छींकने से बचें।  #चिकित्सकीय उपचार - अगर बार-बार नाक में से खून निकलता है , या खून रुक नहीं रहा है, तो डॉक्टर की सलाह लेना जरुरी  है।  *स्थानीय उपचार - नाक में मरहम लगाया जाता है। - कभी-कभी इलेक्ट्रिक कॉटराइजेशन से रक्त वाहिकाओं को सील कर दिया जाता है। #घरेलू और आयुर्वेदिक उपाय *धनिया या तुलसी का रस नाक में डालने से आराम मिलता है। *ठंडा पानी को छिड़कने से भी तुरंत राहत देता है। * शरीर में रक्त की शुद्धि और रक्तस्तंभन में अनार का रास बहुत ही लाभदायी है.  * आहार में ताजा हरी सब्जियाँ,आंवला और नींबू का उपयोग करें, ताकि विटामिन C की कमी न हो। #नाक में से खून निकलने से बचाव के उपाय क्या है? - 1.गर्मियों में समय में सिर पर टोपी रखना सही होता है.  - 2. नाक को बार-बार कुरेदने नहीं चाहिए। - 3 .ब्लड प्रेशर को डेली रूप से जांच करते  रहें।  -4 . शराब, और धूम्रपान से दूरी बनाए रखें। -5 . पर्याप्त पानी पिएँ। # निष्कर्ष नाक में से खून का निकलना सामान्य पर कई बार चिंताजनक हो सकती है। कुछ मामलों में घरेलू उपायों से भी खून रुक जाता है। - अगर यह समस्या बार-बार हो रही है, और फिर भी खून रुक नहीं रहा है, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।
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rheumatic fever treatment in hindi
#रूमैटिक फीवर (Rheumatic Fever)?रूमैटिक फीवर सूजन संबंधी रोग है, जो की, प्रायः अनट्रीटेड स्ट्रेप थ्रोट या स्कार्लेट फीवर की जटिलता के रूप में विकसित होता है। - यह रोग शरीर के कई भागों को असर कर सकता है, जैसे की, हृदय, जोड़ों, त्वचा और मस्तिष्क। - यदि सही समय पर सही इलाज न किया जाए तो यह गंभीर हृदय संबंधी की समस्याओं का कारण बन सकता है। २)रूमैटिक फीवर के कारण? - स्ट्रेप्टोकॉकस बैक्टीरिया संक्रमण :– गले में संक्रमण का सही इलाज न होने पर हो सकता है. - प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया :– बैक्टीरिया से लड़ते समय हमारे शरीर की इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया शरीर के ऊतक पर हमला करने लग जाती है. जिससे सूजन होता है। #प्रमुख लक्षण? गले के संक्रमण से 2 से 4 हफ्ते के बाद रूमैटिक फीवर के लक्षण प्रकट होने लगते हैं:  - जोड़ों में दर्द है रहना और सूजन  - त्वचा पर लाल धब्बे का हो जाना - बुखार और थकान जैसा लगना  ३)संभावित जटिलताएँ? यदि रूमैटिक फीवर का इलाज समय पर न किया जाए तो यह गंभीर परिणाम दे सकता है: - रूमैटिक हार्ट डिज़ीज़ : – हृदय वाल्व को नुकसान पहुँच सकता है। - क्रॉनिक जोड़ों की प्रॉब्लम । - मस्तिष्क संबंधी गड़बड़ियाँ।  ४)निदान? डॉक्टर निम्नलिखित की जाँच कर सकते हैं, जैसे की, - गले की स्वैब टेस्ट - खून की जाँच - ईसीजी या इकोकार्डियोग्राफी  ५)उपचार? रूमैटिक फीवर का इलाज लक्षणों को कम करने और हृदय को होने वाले नुकसान से बचाने पर केंद्रित होता है:  - एंटीबायोटिक्स :– स्ट्रेप्टोकॉकस संक्रमण को खत्म करने के लिए। - एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाइयाँ :– दर्द और सूजन को कम करने के लिए  - एंटी-सीज़र दवाइयाँ – अनियंत्रित गतिविधियों के लिए। -दीर्घकालिक एंटीबायोटिक प्रॉफिलैक्सिस :– दोबारा संक्रमण रोकने के लिए कई सालों तक पेनिसिलिन इंजेक्शन दिए जाते हैं।  #बचाव के उपाय? - डॉक्टर द्वारा दी गई एंटीबायोटिक्स का कोर्स जब तक डॉक्टर नहीं बोले तब तक उस कोर्स को करना चाहिए.  - बच्चों में बार-बार गले की खराश होने पर जांच करना सही है। - हृदय की समस्या वाले मरीजों को नियमित जाँच करवाते रहना चाहिए।
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Sciatica ka homeopathic ilaj
साइटिका (Sciatica): आजकल बदलते जीवनशैली में , ज्यादा समय तक बैठकर काम करने और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण से लोगों में कमर और पैर दर्द की समस्या देखने को ज्यादा मिल रही है. - सबसे ज्यादा देखी जाने वाली समस्या है साइटिका (Sciatica)।  - साइटिका केवल कमर का दर्द ही नहीं है, बल्कि एक विशेष प्रकार का दर्द है, जो की ,शरीर की सबसे लंबी नस साइटिक नर्व से जुड़ा होता है।  - साइटिक की नस कमर के निचले हिस्से से निकलकर जांघों और पिंडलियों से होती हुई पैर की उंगलियों तक जाती है। जब भी किसी कारणवश इस नस पर दबाव पड़ता है, तो दर्द, सुन्नपन या झुनझुनी महसूस होती है, जिसे साइटिका कहा जाता है। २) साइटिका के मुख्य कारण? साइटिका के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें सबसे आम हैं: - स्लिप डिस्क : – रीढ़ की हड्डियो के बीच से डिस्क खिसक जाती है। और नस पर दबाव पड़ता है. - बोन स्पर :– हड्डी पर ज्यादा वृद्धि होकर नस को दबा सकती है।  - चोट या दुर्घटना : – कमर या रीढ़ पर चोट लगने से नस को असर हो सकता है. - मांसपेशियों में खिंचाव : – पिरिफॉर्मिस मांसपेशी में खिंचाव होने से भी साइटिक नर्व पर दबाव पड़ता है। ३) साइटिका के लक्षण? साइटिका के लक्षण अलग -अलग व्यक्ति में अलग होते है. जो की इस तरह से है, - कमर से लेकर पैर तक तेज जैसा दर्द का होना । - पैरों या पंजों में सुन्नपन।  - चलने, दौड़ने या झुकने में परेशानी का होना। - पैरों में कमजोरी या अकड़न।  - गंभीर स्थिति में मूत्र या मल त्याग पर भी असर पड़ सकता है। ४) साइटिका का निदान (Diagnosis)? सही इलाज के लिए सही जांच भी बहुत जरूरी है। डॉक्टर निम्नलिखित तरीकों से साइटिका का पता लगाते हैं: - शारीरिक परीक्षण : – डॉक्टर पेशेंट को झुकने, चलने या पैरों को उठाने जैसी गति विधियाँ करवाते हैं। - X-Ray: – हड्डियों में किसी कमी की जांच के लिए। #साइटिका का उपचार? साइटिका का इलाज मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। शुरुआती मामलों में दवाइयों और फिजियोथेरेपी से आराम मिल जाता है, लेकिन गंभीर स्थिति में अन्य उपायों की जरूरत होती है। - आराम : – ज्यादा मेहनत वाले काम से बचना चाहिए, लेकिन पूरी तरह से बिस्तर पर पड़े रहना भी सही नहीं है। - दवाइयाँ :– दर्द और सूजन कम करने के लिए दर्दनाशक दवाइयाँ दी जाती हैं।  - फिजियोथेरेपी : – एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग से नस पर दबाव कम किया जा सकता है।  - गर्म या ठंडी सिकाईकरने पर भी मांसपेशियों के तनाव और दर्द में राहत मिलती है।  - सर्जरी : – जब इलाज से राहत न मिले तो और समस्या गंभीर हो जाए, तब सर्जरी की जाती है। ५) साइटिका से बचाव के उपाय? - डेली व्यायाम अच्छा होता है.  - हमेशा सही तरीके से बैठें और चलें। - भारी सामान उठाते समय कमर झुकाने के बजाय घुटनों से झुकें। - संतुलित आहार लें और वजन पर कण्ट्रोल रखें। - नियमित कसरत करना अच्छा है.
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Thrombocytopenia ka ilaaj
#थ्रोम्बोसाइटोपेनियाथ्रोम्बोसाइटोपेनिया ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर के खून में प्लेटलेट्स की संख्या सामान्य से भी कम हो जाती है। प्लेटलेट्स छोटे रक्त की कोशिका होती हैं, जो की खून को जमाने  का काम करती हैं। और किसी भी चोट या कट लगने पर अत्यधिक खून बहने से बचाती हैं।शरीर में सामान्यतः रक्त प्लेटलेट्स की संख्या लगभग 1,50,000 से 4,50,000 प्रति माइक्रोलीटर होती है। यदि यह संख्या 1,50,000 से भी कम हो जाए, तो इसे थ्रोम्बोसाइटोपेनिया कहा जाता है। #थ्रोम्बोसाइटोपेनिया के मुख्य कारण क्या है? प्लेटलेट्स की संख्या कम होने के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: - हड्डी के मज्जा से उत्पादन में कमी - ल्यूकेमिया , एप्लास्टिक एनीमिया जैसी बीमारियाँ - कैंसर का इलाज - कुछ दवाइयाँ जो बोन मैरो को असर करती हैं - प्लेटलेट्स का तेजी से खत्म होना - इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी होना - वायरल इंफेक्शन (जैसे की , डेंगू, हेपेटाइटिस, HIV ) - कुछ दवाइयों से एलर्जी  का होना या उसके दुष्प्रभाव #थ्रोम्बोसाइटोपेनिया के लक्षण क्या है?- त्वचा पर नीले या बैंगनी धब्बे  आसानी से पड़ना - छोटे-छोटे लाल या बैंगनी धब्बे - बार-बार नाक से खून का  आना या मसूड़ों से खून का बहना - चोट लगने पर ज्यादा खून बहना -  महिलाओं में मासिक धर्म का रक्तस्राव - पेशाब  में  से खून का आना  #थ्रोम्बोसाइटोपेनिया का निदान?थ्रोम्बोसाइटोपेनिया का पता लगाने के लिए डॉक्टर कुछ जांचें कर सकते हैं, जैसे की ,- कम्प्लीट ब्लड काउंट (CBC) : – खून में प्लेटलेट्स की संख्या का पता लगाने के लिया किया जाता है. - ब्लड स्मीयर टेस्ट : – प्लेटलेट्स की  आकार की जाँच।- बायोप्सी : –प्लेटलेट्स के उत्पादन की स्थिति देखने के लिए।- वायरल मार्कर टेस्ट : – डेंगू, हेपेटाइटिस, HIV बीमारियों की जांच करने के लिए ।#थ्रोम्बोसाइटोपेनिया का उपचार?प्लेटलेट्स की संख्या कितनी कम हो गया है ,इलाज इस बात पर निर्भर करता है. -  यदि प्लेटलेट्स की संख्या थोड़ी कम है और कोई लक्षण नहीं हैं, तो केवल निगरानी  ही पर्याप्त होती है।# थ्रोम्बोसाइटोपेनिया से बचाव और जीवनशैलीडॉक्टर की सलाह के अलावा कोई भी  दवाइयाँ न लें, खासकर वे जो प्लेटलेट्स को असर कर सकती हैं - चोट लगने वाले कार्यों  को करने से बचें। - संतुलित आहार लें, जिस से की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो। - यदि बार-बार खून बहने की समस्या हो, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।
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Diabetes ka homeopathic me ilaaj
#Diabetes  डायबिटीज(मधुमेह) : यह जीवन भर रहने वाली बीमारी जिसे हम मधुमेह कहा जाता है. दीर्घकालिक रोग है, जो की तब होता है, जब शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनाता, या जो इंसुलिन बनता है, उसे सही से उपयोग नहीं कर पाता है । - रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर बढ़ जाना, जिसे हाइपरग्लाइसीमिया भी कहते है। यदि स्थिति को समय पर नियंत्रित न किया जाए, तो यह आंख, किडनी और अन्य अंगों को असर कर सकता है। #१) डायबिटीज के प्रकार? डायबिटीज के मुख्यतः ३ प्रकार के होते है.  - टाइप 1 डायबिटीज शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पैंक्रियास के इंसुलिन बनाने वाले कोशिका को खत्म कर देते है। यह बीमारी आमतौर पर नन्हे बच्चों में पाई जाती है। - टाइप 2 डायबिटीज यह आम प्रकार है। जिसमे की शरीर इंसुलिन बनाता है, पर उपयोग सही से नहीं कर पाता है। यह अधिकतर वयस्कों में और अब तो युवाओं और बच्चों में भी बढ़ रहा है। - गर्भावधि मधुमेह यह गर्भावस्था के समय में होता है। जन्म के बाद समाप्त हो जाता है, पर भविष्य में टाइप 2 डायबिटीज का खतरा हो सकता है। २) डायबिटीज के कारण? - मोटापा या अधिक वजन का हो जाना - शारीरिक गतिविधि की कमी - गलत खान-पान करने से भी  - परिवार में आनुवंशिक कारण से भी - हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल  - उम्र का बढ़ जाना  - कुछ दवाओं का बार बार उपयोग होने से साइड इफेक्ट ३ ) डायबिटीज के लक्षण क्या है? - बार-बार मूत्र का आना  - ज्यादा प्यास का लगना  - ज्यादा भूख लगना - थकान और कमजोरी जैसा होना - घाव या चोट का धीरे-धीरे भरना  - त्वचा में खुजली या संक्रमण का होना  -वजन का कम हो जाना  - हाथ-पैर में सुन्नता ४) डायबिटीज का इलाज (Treatment) अभी तक इसका कोई इलाज नहीं है, पर इसे नियंत्रित किया जा सकता है, ताकि जटिलताओं से बचा जा सके। - इंसुलिन इंजेक्शन - डायबिटीज की दवाइयाँ - नियमित ब्लड शुगर की जांच करना  - संतुलित आहार : – फाइबर, सब्जियां, साबुत अनाज  - नियमित कसरत करना - तनाव को कम करने के लिए ध्यान और मेडिटेशन करना ५) डायबिटीज से बचाव के उपाय? - डेली संतुलित भोजन का उपयोग करना - डेली कम से कम 30 मिनट कसरत करें  - वजन को नियंत्रित रखें - ब्लड शुगर की समय समय पर जांच करते रहना चाहिए. - धूम्रपान और शराब से दुरी रखे. #डायबिटीज से होने वाली संभावित जटिलताएं? - हृदय रोग और स्ट्रोक  - किडनी फेल्योर - आंखों की रोशनी का कम होना या अंधापन जैसा लगना  - पैरों में घाव और संक्रमण  - त्वचा का संक्रमण
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Emotional eating ka ilaaj
१) Emotional eating? आज के जीवन में, बहुत से लोग ऐसे हैं जो , चिंता, गुस्सा या अकेलेपन जैसे भावनाओं से निपटने के लिए भोजन का सहारा लेते हैं। इसे ही इमोशनल ईटिंग (Emotional Eating) भी  कहते है। यह आद धीरे-धीरे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को असर करने लगती है। - इमोशनल ईटिंग का अर्थ है की, जब हम भूख के लिए नहीं  बल्कि अपनी भावनाओं को शांत करने के लिए खाने को  खाते हैं। - यह असली भूख नहीं , बल्कि असंतुलन का नतीजा होता है, जिसमें खाना एक अस्थायी राहत देता नहीं है। २) इमोशनल ईटिंग क्यों होती है? (मुख्य कारण) - तनाव और चिंता: जब शरीर तनाव होता है, तो वह कोर्टिसोल नामक  हार्मोन को छोड़ता है, जो हमें ज्यादा खाने लिए प्रेरित करता है- मीठा, तला हुआ या ज्यादा कैलोरी वाला भोजन। - अकेलापन: जब हमें कुछ करने को नहीं होता है ,तो   हम अकेला महसूस करते हैं, तो खाने का सहारा लेते हैं, जिससे मन को कुछ समय के लिए व्यस्त हो जाता है। - बचपन की आदतें: बचपन में माता-पिता हमें चॉकलेट ,टॉफी देकर मन को शांत कराते हैं। यही आदत बड़े होकर इमोशनल ईटिंग में परिवर्तन होता है। - नकारात्मक भावनाएं: मन का उदास होना , शर्म, गुस्सा जैसी भावनाएँ भी हमें "कम्फर्ट फूड" की ओर खिचती है. - सामाजिक दबाव: कभी-कभी दूसरों के साथ होने पर भी हम ज्यादा खाना खा जाते है.  ३) कैसे पहचानें कि यह इमोशनल ईटिंग है? इमोशनल ईटिंग की पहचान करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन नीचे दिए गए संकेतों से आपको समझने में मदद मिलेगी - खाने के बाद शर्म जैसा महसूस करना  - तनाव या उदासी के दौरान बिना भूख के भी खाना - भले ही  हमारा पेट भरा हो पर बार-बार खाने की इच्छा जैसा होना।  - भोजन के माध्यम से अच्छा महसूस करना #४) इमोशनल ईटिंग के क्या दुष्परिणाम है? इमोशनल ईटिंग शरीर और मन दोनों को असर करता है:  - वजन का बढ़ना : बार-बार खाने से भी मोटापे का कारण बनता है। - तलीय और मीठा खाना लगातार लेने से ये बीमारियाँ हो सकती हैं।-ज़्यादा खाने के बाद में व्यक्ति को शर्म महसूस होती है, जिससे आत्मसम्मान को असर होता है। - धीरे-धीरे व्यक्ति को भूख और खाने की आदतों नियंत्रण नहीं होता है. - डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी समस्याएँ भी और गहरी हो सकती हैं।  ४) इमोशनल ईटिंग से कैसे निपटें? (उपाय और समाधान) जब भी खाने का मन हो,तो पहले खुद से पूछें – क्या मुझे सही में भूख लगी है या मैं किसी भावना से भाग रहा हूँ?  - जब भी तनाव हो, किताब पढ़ें, टहलने जाएं। - हम क्या - क्या खा रहे हैं, यह आदतें समझने में मदद मिलेगी। - धीरे-धीरे खाएं, हर निवाले का स्वाद लें. - योग मानसिक संतुलन को बनाने में मदद करता है. ५) बचाव के उपाय? - घर में हेल्दी स्नैक्स रखें, जैसे की फल, ड्राई फ्रूट्स, या स्प्राउट्स।  - भावनाओं को कण्ट्रोल करना - नियमित रूप से कसरत करना चाहिए। - भरपूर नींद लेना अच्छा होता
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Fistula ka ilaaj | fistula treatment in homeopathy
१) फिस्टुला क्या है? फिस्टुला एक "एपिथीलियलाइज़्ड" मार्ग होता है, जो की , दो शरीर की सतहों को जोड़ता है – जैसे की, दो अंग, दो नसें, या किसी अंग और त्वचा को। - यह मार्ग सामान्य रूप से मौजूद नहीं होता है, बल्कि किसी रोग, संक्रमण, चोट, या सर्जरी के बाद बन सकता है। - यदि फिस्टुला एक बार बन जाए तो यह शरीर में मवाद, मल, मूत्र या अन्य द्रवों के रिसाव का कारण बन सकता है। २) फिस्टुला क्यों होता है? फिस्टुला पीछे आमतौर पर संक्रमण, सूजन, चोट या सर्जरी मुख्य कारण होते हैं। - जब शरीर के अंदर कोई घाव पूरी तरह से ठीक नहीं होता है, तो वह एक नली के रूप में बाहर निकलने का रास्ता बना लेता है। - शरीर प्राकृतिक रूप से उस संक्रमित सामग्री को बाहर निकालने की कोशिश करता है, जिससे यह मार्ग (फिस्टुला) बनता है। #फिस्टुला के होने के कारण? फिस्टुला बनने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ हैं:  - एनल फिस्टुला : मलद्वार के पास बनने वाला फिस्टुला, जो एनल गुदा ग्रंथियों में संक्रमण के कारण बनता है। यह सबसे आम प्रकार है।  - क्रोहन रोग : यह क्रॉनिक आंतों की बीमारी है, जिसमें लंबे समय तक सूजन रहने के कारण आंतों के बीच या आंत और त्वचा के बीच फिस्टुला बन सकता है। - सर्जरी या चोट : किसी ऑपरेशन के बाद अगर घाव सही से नहीं भरता है ,या वहां संक्रमण हो जाता है, तो फिस्टुला बन सकता है। - टीबी या अन्य संक्रमण : फेफड़ों, आंतों या त्वचा में पुराना संक्रमण फिस्टुला का कारण बन सकता है। ३)फिस्टुला के लक्षण क्या है? फिस्टुला के लक्षण इसके स्थान और कारण पर निर्भर करते हैं, लेकिन सामान्यतः निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं:  - मवाद या खून का लगातार रिसाव  - फोड़े जैसा घाव जो बार-बार ठीक होने पर भी फिर से निकलता है  - बुखार और कमजोरी - मल या मूत्र के रास्ते में गड़बड़ी  - फिस्टुला क्षेत्र में दर्द, सूजन और जलन ४) फिस्टुला से बचाव के उपाय क्या है? - साफ-सफाई का ध्यान रखें, खासकर एनल क्षेत्र की। - कब्ज से बचें और फाइबर युक्त आहार को लेना सही होता है. - किसी भी संक्रमण का समय पर इलाज कराएं।  - क्रोहन रोग या अन्य पुरानी बीमारियों का सही प्रबंधन करें। *निष्कर्ष*   फिस्टुला गंभीर लेकिन पूरी तरह से इलाज की स्थिति है। इसके लक्षणों को नजरअंदाज नही करें और समय रहते डॉक्टर से संपर्क करें।
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hfmd bimari ka ilaaj
हैंड, फुट एंड माउथ डिज़ीज (HFMD) संक्रामक बीमारी *परिचय* हैंड, फुट एंड माउथ डिज़ीज (HFMD) सामान्य वायरल की बीमारी है, जो की, मुख्यतः छोटे बच्चों और शिशुओं को असर करती है। यह बीमारी वयस्कों में होता  है, पर बच्चों में इसका संक्रमण ज्यादा तेजी से फैलता है। - HFMD संक्रामक रोग है जो की कॉक्ससैकी वायरस और कभी-कभी एंटरोवायरस  के कारण से होता है। १) HFMD बीमारी के लक्षण क्या हैं? इस बीमारी के लक्षण वायरस के शरीर में प्रवेश करने के बाद में  3 से 5  दिन बाद सामने आते हैं, जिसे ‘इन्क्यूबेशन पीरियड’ भी कहा जाता है। - तेज बुखार का आना - गले में खराश या दर्द का रहना - मुँह के अंदर छाले या अल्सर, खासकर जीभ, मसूड़ों और गाल के अंदर - हाथों और पैरों पर लाल चकत्ते या फुंसियाँ, जो कभी-कभी दर्दनाक या खुजलीदार हो सकते हैं  - थकान, चिड़चिड़ापन और भूख में कमी  २) HFMD बीमारी कैसे फैलती है? HFMD बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकती है: जैसे की ,  - संक्रमित व्यक्ति के नाक या गले के स्राव से - संक्रमित व्यक्ति के थूक या उनके  खांसी के माध्यम से  - छाले के तरल पदार्थ से  - संक्रमित सतहों या वस्तुओं को छूने से - छोटे बच्चों में यह ज़्यादा यह बीमारी फैलती है, क्योंकि वे सफाई का ध्यान नहीं रखते है, एक-दूसरे के खिलौनों, वस्तुओं को साझा करते हैं। ३) HFMD रोकथाम के उपाय? HFMD से बचने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सावधानियाँ अपनाना ज़रूरी है: जैसे की ,  - साबुन से अपने हाथों को बार-बार धोना, खासकर बच्चे की नैपी बदलने के बाद। - बच्चों के बोतल, खिलौने व्यक्तिगत वस्तुओं को साझा न करें। - अगर किसी भी बच्चे को HFMD है, तो उसे  कुछ दिन दूर रखें।  - रोज़मर्रा की चीज़ों को अच्छे से सफाई  करना ज़रूरी है।  #उपचार और देखभाल? HFMD के लिए कोई दवा नहीं होती है, क्योंकि यह वायरल बीमारी है, और अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन लक्षणों से राहत पाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं: - बुखार और दर्द के लिए पैरासिटामोल जैसी दवाएं को दिया जाता है।  - नरम और ठंडे खाद्य पदार्थ दें जो मुँह में छालों को परेशान न करें। - उचित तरल पदार्थ को पिलाएँ ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। - बच्चे को पर्याप्त नींद और आराम की ज़रूरत होती है। अगर बच्चे को तेज़ बुखार के साथ शरीर में कंपन, लगातार उल्टी या अत्यधिक सुस्ती हो रही हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। #क्या HFMD खतरनाक है? HFMD गंभीर नहीं होता है ,और बिना किसी दवा के ठीक हो जाता है। पर कुछ दुर्लभ मामलों में यह न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं, जैसे मस्तिष्क ज्वर  या मेनिन्जाइटिस का कारण बन सकता है, इसलिए HFMD को हल्के में लेना सही नहीं है। *निष्कर्ष* हैंड, फुट एंड माउथ डिज़ीज एक सामान्य लेकिन तेज़ी से फैलने वाली बीमारी है। बच्चों में इसका खतरा अधिक होता है लेकिन सही देखभाल और सफाई से इससे बचा जा सकता है। माता-पिता और अभिभावकों को इसके लक्षणों को पहचानना और समय पर इलाज कराना बहुत ज़रूरी है। अगर आपके बच्चे में HFMD के लक्षण दिखाई दें तो उसे घर पर आराम दें, साफ-सफाई रखें और ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लें।
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Hypercalcemia ka ilaaj
#हाइपरकैल्सीमिया शरीर के लिए कैल्शियम एक महत्वपूर्ण मिनरल है, जो हड्डियों की मजबूती, मांसपेशियों की गतिविधियों, नसों के संचार और हार्मोन स्राव के लिए ज़रूरी होता है। लेकिन जब यह कैल्शियम सामान्य से अधिक मात्रा में खून में जमा हो जाता है, तो उसे हाइपरकैल्सीमिया कहा जाता है। यह स्थिति कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है और समय रहते इसका इलाज न किया जाए, तो यह घातक भी साबित हो सकती है। १) हाइपरकैल्सीमिया क्या है? हाइपरकैल्सीमिया ऐसी अवस्था है, जिस में खून में कैल्शियम का स्तर सामान्य से भी (8.5–10.5 mg/dL) से ज्यादा हो जाता है. - यह ज्यादा कैल्शियम शरीर की अलग - अलग महत्वपूर्ण प्रक्रिया पर नकारात्मक असर डाल सकता है — जैसे की , हड्डियाँ का कमजोर होने लग जाना , किडनी का कार्य करने पर भी असर होता है, और मानसिक कार्य क्षमता में भी असंतुलित हो सकती है। २) हाइपरकैल्सीमिया के प्रमुख कारण? - अति सक्रिय पैराथायरॉइड ग्रंथियाँ : यह हाइपरकैल्सीमिया का आम कारण है। जब की, पैराथायरॉइड ग्रंथियाँ ज्यादा मात्रा में पैराथायरॉइड हार्मोन का उत्पादन करती हैं, तो यह हड्डियों में से कैल्शियम को बाहर निकालकर खून में छोड़ देती हैं, जिससे खून में कैल्शियम का लेवल असामान्य रूप से बढ़ जाता है। - कैंसर : कुछ तरह के कैंसर जैसे की, फेफड़े, स्तन या ब्लड कैंसर भी हाइपरकैल्सीमिया का कारण बन सकते हैं। यह ट्यूमर की वजह से हड्डियों में टूट-फूट या कैल्शियम से रिलीज से होता है। - ज्यादा मात्रा में विटामिन - D लेने से शरीर में कैल्शियम का अवशोषण बढ़ जाता है, जिससे हाइपरकैल्सीमिया हो सकता है।  - कुछ दवाएं जैसे की ,थायाजाइड डाइयूरेटिक्स, लिथियम या विटामिन सप्लीमेंट्स हाइपरकैल्सीमिया को बढ़ावा दे सकती हैं। ३) हाइपरकैल्सीमिया के लक्षण? हाइपरकैल्सीमिया के लक्षण उसकी तीव्रता पर निर्भर करते हैं। कुछ मामलों में कोई विशेष लक्षण नहीं होते है, लेकिन जब कैल्शियम का स्तर ज्यादा हो जाता है, तो निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं:  - ज्यादा प्यास लगने और बार-बार पेशाब का आना  - कब्ज़ और अपच - पेट में दर्द और मतली  - मांसपेशियों में कमजोरी और थकान का लगना  - हड्डियों में दर्द जैसा लगना - मानसिक भ्रम, या चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन - दिल की धड़कन का असामान्य होना - गुर्दे का खराब हो जाना #हाइपरकैल्सीमिया का निदान कैसे होता है? हाइपरकैल्सीमिया का पता लगाने के लिए डॉक्टर निम्नलिखित जांचें करते हैं:  - ब्लड का टेस्ट : कैल्शियम का स्तर, PTH हार्मोन, विटामिन D, क्रिएटिनिन  - यूरीन का टेस्ट : शरीर से कैल्शियम का कितना उत्सर्जन हो रहा है - ECG : यदि दिल की धड़कन में गड़बड़ी है तो #हाइपरकैल्सीमिया का इलाज इलाज की योजना कैल्शियम के स्तर और कारण पर निर्भर करती है: - उचित पानी की मात्रा  - डाइट में कैल्शियम और विटामिन - D का संतुलन  - दवाओं की समीक्षा  - डाययूरेटिक्स : जैसे फ्यूरोसेमाइड, जो कैल्शियम को यूरीन के माध्यम से बाहर निकालने में मदद करते हैं बिसफॉस्फोनेट्स : ये हड्डियों से कैल्शियम रिलीज को रोकते हैं। - हार्मोन में जो की रक्त में कैल्शियम को कम करता है  - अगर पैराथायरॉइड ग्रंथि में ट्यूमर हो तो ऑपरेशन #हाइपरकैल्सीमिया से बचाव कैसे करें? - डॉक्टर की सलाह से ही विटामिन - D और कैल्शियम सप्लीमेंट का प्रयोग करें। - पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और डिहाइड्रेशन से बचना चाहिए. - कोई भी नई दवा के सेवन से पहले डॉक्टर से सलाह लें. - स्वस्थ जीवनशैली को अपनाएं और डेली व्यायाम करें। *निष्कर्ष* हाइपरकैल्सीमिया गंभीर स्थिति है, जो की शरीर के कई भागो को असर कर सकती है, लेकिन अगर समय रहते इसका पहचान हो जाए तो उचित उपचार शुरू कर दिया जाए, तो इसे सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।
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