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peptic ulcer treatment in homeopathic
१) पेप्टिक अल्सर क्या होता है ? पेप्टिक अल्सर गंभीर पाचन का रोग है, जिसमें पेट की अंदरूनी परत, छोटी आंत के पहले भाग, या कभी-कभी इसोफेगस की परत में घाव बन जाते हैं। - यह घाव अम्ल और पाचन एंजाइम के संपर्क में आने के बाद में दर्द, जलन, गैस, जैसे लक्षण दिखाई दे सकते है. * पेप्टिक अल्सर दो प्रकार के होते हैं? १) गैस्ट्रिक अल्सर – ये तो पेट की परत में होता है. २) ड्यूओडेनल अल्सर – जो छोटी आंत के ऊपरी भागो में होता है. इस लेख में हम पेप्टिक अल्सर के इलाज, घरेलू उपाय, जीवनशैली में बदलाव और रोकथाम के उपायों पर बात करने वाले है।  २ ) पेप्टिक अल्सर के मुख्य कारण क्या होते है? - H. pylori बैक्टीरिया का संक्रमण - अत्यधिक पेनकिलर का उपयोग करना। - धूम्रपान और शराब का सेवन करना से - ज्यादा मानसिक तनाव  - मसालेदार भोजन  ३) पेप्टिक अल्सर का लक्षण क्या होता है? * भूख न लगना : अल्सर के कारण खाने की इच्छा भी कम हो। * वजन का घट जाना : दर्द या खाने की अनिच्छा के कारण वजन भी कम हो जाता है। * पेट का फूल जाना : पेट में गैस और सूजन हो जाने से पेट फूल जाता है  * मतली और उल्टी * उल्टी में खून का आना : गंभीर मामलों में, उल्टी में खून आ सकता है.  ४) पेप्टिक अल्सर का जीवनशैली में बदलाव - धूम्रपान सेवन बंद करना - शराब से दूर रहना - भोजन को अच्छे से बार बार चबाकर खाना - खाली पेट में एसिड का स्तर ज्यादा होता है - रात में खाना खाने के बाद में तुरंत नहीं सोना - तनाव से बचें।  - तेल-मसाले, और चाय-कॉफी का सेवन कम करना। ५ . भोजन में क्या खाना चाहिए ? - दलिया, उबली सब्जियां ,खिचड़ी। - दही, केला, सेब, पपीता  - नारियल पानी पीना अच्छा होता है *क्या नहीं खाना चाहिए ?* - बासी भोजन ,तीखा खाना नहीं खाना चाहिए। - सोडा, कोल्ड ड्रिंक - टमाटर, सिरका जैसे खट्टे खाद्य
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bachho me Mesenteric Lymph Nodes jayada kyu hota hai
१) बच्चों में मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स (Mesenteric Lymph Nodes) अधिक क्यों दिखाई देते हैं? मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स छोटे-छोटे लिम्फ ग्रंथि होती हैं जो की आंतों के आसपास की मेसेंट्री नामक झिल्ली में होती हैं। - इनका मुख्य काम शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना और संक्रमण से लड़ना होता है। - बच्चों में ये लिम्फ नोड्स कई बार अल्ट्रासाउंड या अन्य जांचों में सामान्य से बड़े दिखाई देते हैं, जिसे mesenteric lymphadenitis कहा जाता है। यह स्थिति अक्सर चिंताजनक नहीं होती लेकिन इसके कारण और लक्षणों को समझना आवश्यक होता है। * 1. बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली का विकासशील होना बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली अभी विकास के चरण में होती है। इसलिए जब कोई वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण होता है, तो शरीर की रक्षा प्रणाली तुरन्त सक्रिय हो जाती है। - मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स इन संक्रमणों के प्रति बहुत जल्दी प्रतिक्रिया करते हैं और सूज जाते हैं। - इसका मतलब यह है कि ये लिम्फ नोड्स ठीक से कार्य कर रहे हैं, न कि कोई गंभीर बीमारी का संकेत। 2. वायरल संक्रमण — सबसे सामान्य कारण बच्चों में मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स के बढ़ने का सबसे नार्मल कारण वायरल का संक्रमण होता है, जैसे की , एडेनोवायरस , रोटावायरस , एंटरोवायरस ये वायरस पेट में दर्द, डायरिया, उल्टी और बुखार जैसे लक्षण पैदा करते हैं, जो "पेट की वायरल बीमारी" के रूप में सामने आते हैं। लिम्फ नोड्स इस वायरस से लड़ने में सक्रिय हो जाते हैं और सूज जाते हैं। 3. गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल का संक्रमण आंतों में होने वाले जीवाणु संक्रमण , या बैक्टीरिया के कारण आंतों की सूजन (gastroenteritis) होती है, जिससे मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स बड़ा हो सकते हैं। - कई बार यह स्थिति एपींडिसाइटिस की नकल करती है क्योंकि दोनों में पेट के निचले दाएं हिस्से में दर्द होता है। 4. टॉन्सिलिटिस और ऊपरी श्वसन संक्रमण कई बार बच्चों में गला खराब होना, टॉन्सिल का बढ़ना या सर्दी-खांसी जैसे संक्रमण भी शरीर के अन्य लिम्फ नोड्स के साथ-साथ मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स को भी प्रभावित करते हैं। - ये सभी लिम्फ ग्रंथियाँ आपस में ही जुड़ी होती हैं और संक्रमण के प्रति एकजुट होकर प्रतिक्रिया देती हैं। 5. अनावश्यक जांच आजकल डॉक्टर किसी भी पेट दर्द की शिकायत में अल्ट्रासाउंड की सलाह देते हैं। इस वजह से मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स की सूजन अक्सर "incidentally" यानी कि गलती से पता चलती है, जब वो किसी और कारण से अल्ट्रासाउंड करा रहे होते हैं। यह सूजन आमतौर पर अस्थायी और हानिरहित होती है। 6. कुछ दुर्लभ लेकिन गंभीर कारण हालांकि अधिकांश मामलों में यह स्थिति सामान्य होती है, लेकिन कुछ दुर्लभ मामलों में मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स का बढ़ना गंभीर रोगों का संकेत हो सकता है, जैसे: - ट्यूबरकुलोसिस - लिम्फोमा - क्रोहन डिजीज इन मामलों में लक्षण लम्बे समय तक बने रहते हैं जैसे वजन घटना, रात में पसीना आना, लगातार बुखार आदि। 7. उपचार और देखभाल अधिकांश बच्चों में मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स कुछ दिनों या हफ्तों में अपने आप सामान्य हो जाते हैं। यदि बच्चा सामान्य रूप से खा-पी रहा है और गंभीर लक्षण नहीं हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं होती। * उपचार में शामिल हो सकते हैं: - तरल पदार्थों में भरपूर मात्रा  - आराम  - वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण की स्थिति में डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाएं  - पेट दर्द या बुखार के लिए पैरासिटामोल निष्कर्ष बच्चों में मेसेंट्रिक लिम्फ नोड्स का बढ़ना आम है और ज्यादातर मामलों में यह संक्रमण की सामान्य प्रतिक्रिया होती है। इस से कोई भी डरने की जरूरत नहीं होती, जब तक कि लक्षण गंभीर न हों या लंबे समय तक न बने रहें। यदि पेट दर्द लगातार बना रहे, बच्चा कमजोर दिखे या वजन तेजी से घटे, तो बाल रोग विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क करना चाहिए।
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enterocolitis treatment in adults
१) एंटरोकोलाइटिस क्या है? एंटरोकोलाइटिस गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल की समस्या है ,जिसमें आंतों की सूजन हो जाती है। यह बड़ी आंत ,और छोटी आंत दोनों को असर करती है। - यह स्थिति खासकर नवजात शिशुओं और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले मरीजों में ज्यादा देखने को मिल जाती है। - इसका सही समय पर इलाज न होने पर यह जानलेवा भी हो सकती है। २) एंटरोकोलाइटिस के क्या लक्षण होते है ? एंटरोकोलाइटिस के लक्षण निचे बताया है ,  - पेट में सूजन या दर्द का होना  - कभी-कभी खून के साथ दस्त लगना  - बुखार - उल्टी  -पेट में गैस बनना ३) एंटरोकोलाइटिस के मुख्य कितने प्रकार होते है? - नेक्रोटाइज़िंग एंटरोकोलाइटिस – यह शिशुओं में पाई जाने वाली स्थिति है जिसमें आंतों के ऊतक मरने लग जाते हैं।  - क्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल एंटरोकोलाइटिस – यह संक्रमण एक बैक्टीरिया के कारण होता है - इंफेक्शियस एंटरोकोलाइटिस – यह वायरस, बैक्टीरिया या परजीवियों के कारण होती है, ४) एंटरोकोलाइटिस के क्या कारण होते है ? एंटरोकोलाइटिस के कारण निचे बताया है ,  - वायरस : नोरोवायरस, रोटावायरस, और एडेनोवायरस जैसे वायरस एंटरोकोलाइटिस का कारण बनते है. - परजीवी : जियार्डिया और क्रिप्टोस्पोरिडियम जैसे परजीवी एंटरोकोलाइटिस का कारण बन सकते हैं। - गैर-संक्रामक कारण : सूजन आंत्र रोग क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी स्थितियां बनती है। - कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव से भी एंटरोकोलाइटिस हो सकता है।- इस्केमिया : आंतों में रक्त के प्रवाह में कमी एंटरोकोलाइटिस का कारण बन सकती है.  - सीलिएक रोग: आंतों की सूजन का कारण बन सकती है. - कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली: कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों को एंटरोकोलाइटिस होने का खतरा अधिक होता है. ५) एंटरोकोलाइटिस का निदान क्या है ? एंटरोकोलाइटिस के निदान के लिए उपयोग किए जाने वाले जाँच  - शारीरिक परीक्षण : डॉक्टर पेट में सूजन, कोमलता और अन्य संभावित लक्षणों की जांच करते हैं। - रक्त का परीक्षण : रक्त परीक्षण से सूजन के अन्य लक्षणों की जांच की जाती है।  - इमेजिंग परीक्षण : पेट का एक्स-रे, सीटी स्कैन या एमआरआई स्कैन आंतों में सूजन, को देखने में मदद कर सकते हैं।
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pseudo pancreatic cyst treatment in homeopathic
१) पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट कैसे होता है? अग्नाशय में सूजन या चोट लग जाने से होती है, तो पाचन एंजाइम लीक होने लग जाते हैं और अग्नाशय के आसपास के ऊतकों में जमा होने लग जाते हैं, जिससे स्यूडोसिस्ट का निर्माण होता है।  - यदि इसका समय पर सही इलाज न किया जाये तो ये आगे चल कर खतरा हो सकता है। २) पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट के क्या कारण दिखाई देते है? पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट के कारण निचे बताये गए अनुसार हो सकते है ,जैसे की - पित्त में पथरी का होना - शराब का ज्यादा सेवन करना - डक्ट सिस्टम में ब्लॉकेज - अग्न्याशय में संक्रमण : अगर अग्न्याशय में संक्रमण हो तो वहाँ की कोशिकाएं नष्ट हो जाएँ, जिस से तरल पदार्थ एकत्रित कर सकती हैं, जो आगे चलकर स्यूडोसिस्ट बन जाता है। - अग्न्याशय में चोट ३) पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट के क्या लक्षण होते है? कुछ स्यूडोसिस्ट बिना किसी लक्षण के भी हो सकते हैं, परंतु जब सिस्ट बड़ा हो जाता है या दबाव डालता है तो ये लक्षण सामने आ सकते हैं:  -पेट में ऊपरी हिस्से में दर्द - सूजन या भारीपन महसूस होना - उल्टी या मतली - पाचन संबंधी समस्याएं - भूख में कमी  - पीलिया  ४) पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट के लिए क्या-क्या जांच होते है? पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट की पुष्टि के लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:  - अल्ट्रासाउंड - सीटी स्कैन : सिस्ट के आकार का पता करने के लिए - एमआरआई या एमआरसीपी : पैंक्रियाटिक डक्ट की स्थिति देखने के लिए - एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड : ज्यादा सटीक और बायोप्सी के लिए ५) पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट का क्या उपचार है ? इलाज इस पर निर्भर करता है कि सिस्ट का आकार कितना है, लक्षण हैं या नहीं, और कोई जटिलता तो नहीं है। 1. निगरानी (Observation) यदि सिस्ट छोटा (5 सेमी से कम) है, बिना लक्षण है और कोई जटिलता नहीं है, तो इसे 4–6 सप्ताह तक निगरानी में रखा जा सकता है। CT या MRI द्वारा फॉलोअप किया जाता है। कई बार ऐसे सिस्ट अपने आप ठीक हो जाते हैं।  2. एंडोस्कोपिक ड्रेनेज (Endoscopic Drainage) यदि सिस्ट बड़ा हो गया है या लक्षण दे रहा है, तो एंडोस्कोपी द्वारा सिस्ट से द्रव निकाला जाता है। इसके लिए मुंह के माध्यम से एक ट्यूब डाली जाती है जो सिस्ट में जाकर फ्लूइड बाहर निकालती है। 3. पर्क्यूटेनियस ड्रेनेज (Percutaneous Drainage) अल्ट्रासाउंड या CT के गाइड से, पेट की त्वचा से सुई डालकर सिस्ट से फ्लूइड निकाला जाता है। यह तब किया जाता है जब एंडोस्कोपी संभव न हो। 4. सर्जरी यदि सिस्ट में संक्रमण हो गया है, बार-बार बना रहा है, या एंडोस्कोपी से लाभ नहीं हो रहा, तो सर्जरी की जाती है। सिस्ट को आंत (jejunum) से जोड़कर फ्लूइड को बाहर निकलने का रास्ता बनाया जाता है। इस प्रक्रिया को सिस्टोजेजुनोस्टॉमी कहा जाता है।  * जीवनशैली और सावधानियां * - शराब का सेवन पूरी तरह बंद करें  - वसा युक्त भोजन से परहेज करें - पाचन को आसान बनाने के लिए हल्का और सुपाच्य भोजन लें  - डॉक्टर के निर्देश अनुसार दवाइयों का सेवन करें  - नियमित फॉलोअप जांच करवाएं
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homeopathy me liver cirrhosis ka ilaj
१) लीवर सिरोसिस क्या है ? लीवर सिरोसिस को हम यकृत का सिरोसिस के नाम से भी जानते है ,यह गंभीर बीमारी है ,जिसमें लीवर की कोशिकाएं धीरे-धीरे खत्म होने लग जाती है और उनकी जगह कठोर ऊतक बनने लग जाते है। - यह स्थिति लीवर के कार्यों में बाधा करती है,अगर उचित समय पर उपचार न हो, तो यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है। २) लीवर सिरोसिस होने के क्या कारण है ? लीवर सिरोसिस कई कारणों से हो सकता है, जो की निचे बताये गए अनुसार है, - ज्यादा शराब सेवन : – अधिक समय तक शराब पीने से लीवर की कोशिकाएं खत्म हो जाती है। - वायरल संक्रमण होने से लीवर को नुकसान पहुँचाते हैं। - नॉन-ऐल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज : – मोटापा, मधुमेय और उच्च कोलेस्ट्रॉल जैसे कारणों से लीवर में चर्बी जमने लग जाती है। - जेनेटिक रोग:- अगर पारिवारिक में कोई को भी यह बीमारी है , तो इसके बढ़ने के खतरा ज्यादा है। ३) लीवर सिरोसिस होने के क्या लक्षण होते है? लीवर सिरोसिस होने के लक्षण निचे बताया है ,जैसे की , - लगातार थकान लगना - भूख में कमी का होना  - पेट फूलना या दर्द का होना  - आंखों का पीला हो जाना  - पैरों में सूजन का आना - उल्टी या मल में से खून का आना  - मानसिक भ्रम होना ४) लीवर सिरोसिस का सही इलाज क्या है? लीवर सिरोसिस का कोई पूरी तरह से इलाज नहीं है, पर सही उपचार और जीवनशैली में बदलाव करके इसे कम किया जा सकता है।  1. शराब से परहेज :- शराब से दूरी बनाना बहुत ही जरूरी है।  - वायरल हेपेटाइटिस का इलाज :- सिरोसिस हेपेटाइटिस B या C के कारण है तो एंटीवायरल दवाइयों का कोर्स दिया जाता है। 2 . पोषण और आहार लीवर सिरोसिस वाले पेशेंट को खास डाइट प्लान का उपयोग करना चाहिए। - प्रोटीन :- कम मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन लेना चाहिए। जैसे की अंडा, दाल, पनीर । - नमक : कम मात्रा में लें  - शराब और वसायुक्त खाद्य पदार्थों से दुरी रखना ।  3 . जीवनशैली में बदलाव करना - शरीर के वजन को कण्ट्रोल में रखने के लिए रोज कसरत करना अच्छा होता है - धूम्रपान या शराब से दूर रहें।  4 . लीवर सिरोसिस से उत्पन्न होने वाली समस्याएं  - (पेट में पानी भर जाना): - यदि पेट की नसें फट जाएं तो एंडोस्कोपी के द्वारा इलाज होता है।
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ulcerative colitis ka upchaar
१) अल्सरेटिव कोलाइटिस क्या है? अल्सरेटिव कोलाइटिस लम्बे समय तक सूजन की आंत विकार है, जो मुख्य रूप से बड़ी आंत और मलाशय के अंदर परत को असर करता है। - इस में आंतों की परतों पर सूजन और घाव बन जाते हैं ,जिस से दस्त, पेट में दर्द, रक्तस्राव, थकावट जैसी समस्याएं होती हैं। - इसका इलाज सही समय पर न किया जाए तो यह भी बीमारी जटिल हो जाती है। २) अल्सरेटिव कोलाइटिस होने पर क्या लक्षण दिखाई देते है? अल्सरेटिव कोलाइटिस के लक्षण निचे अनुसार हो सकते है, जैसे की ,- कभी-कभी खून के साथ दस्त - पेट में ऐंठन का होना - बुखार - वज़न का घट जाना  - मलाशय में जलन का होना  ३) अल्सरेटिव कोलाइटिस होने पर क्या कारण होते है? अल्सरेटिव कोलाइटिस होने के कारण निचे बताये गए है, जो की इस प्रकार से है.  - स्वप्रतिरक्षी प्रतिक्रिया : ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली आंतों में स्वस्थ ऊतकों पर हमला करती है.  - आनुवंशिकी : यदि उनके परिवार में यह बीमारी है. तो इसका होने का खतरा ज्यादा होता है।  - पर्यावरणीय कारक - आंत का माइक्रोबायोम : आंतों में होने वाले बैक्टीरिया , वायरस और कवक का मिश्रण, जिसे हम माइक्रोबायोम भी कहते है। - तनाव  - आयु    ४ ) अल्सरेटिव कोलाइटिस होने पर खान-पान और जीवनशैली में बदलाव? ( 1 ) खाने में क्या लेना चाहिए।  - खिचड़ी, दही-चावल - उबली हुई सब्जियाँ  - नारियल पानी या हर्बल चाय ( 2 ) खाने में क्या न खाएं।  - अधिक मसालेदार खाना नहीं खाना चाहिए।  - डेयरी उत्पाद ( 3 ) जल का सेवन  - दिन भर में उचित पानी पिएं - नारियल पानी और ग्लूकोज का पानी बहुत ही अच्छा होता है।
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homeopathy me acute pancreatic ka ilaaj
एक्यूट पैंक्रियास का होमियोपैथी में इलाज एक्यूट पैंक्रियास बीमारी में , अग्न्याशय पर अचानक से सूजन आ जाती है।अग्नाशय पेट के पीछे स्थित एक भाग है जो की पाचन में मदद करता है, और शरीर में इंसुलिन बनाने का काम भी करता है। - यदि सही समय पर एक्यूट पैंक्रियास का इलाज न किया जाए तो यह जानलेवा भी हो सकता है। १) एक्यूट पैंक्रियास के प्रमुख कारण क्या होते है ? एक्यूट पैंक्रियास होने के कारण निचे बताये अनुसार हो सकते है , जैसे की , - ज्यादा शराब का सेवन करने से पैंक्रियास पर नकारात्मक असर भी पड़ता है। - पित्ताशय की पथरी – पैनक्रियाटिक डक्ट को अवरुद्ध करके सूजन पैदा करती है। - खून में ट्राइग्लिसराइड का स्तर ज्यादा होना । - दवाओं के साइड इफेक्ट - इन्फेक्शन: – पेट पर चोट या सर्जरी के कारण भी हो सकता है। २) एक्यूट पैंक्रियास के होने पर क्या लक्षण होते है ? एक्यूट पैंक्रियास के होने पर निचे बताये गए अनुसार लक्षण हो सकते है ,जैसे की , - पेट के ऊपरी भाग में तेज दर्द का होना जो की पीठ तक फैल सकता है.  - जी मिचलाना या उल्टी  - पसीना आना - भूख में कमी हो जाना - तेज़ दिल की धड़कन ३) एक्यूट पैंक्रियास इलाज के बाद क्या देखभाल करना चाहिए ? * 1. आहार में परिवर्तन करने से  - हल्का, कम चर्बी वाला भोजन करना  - मसालेदार भोजन नहीं करना  - शराब और धूम्रपान से दुरी बनाये रखना  * 2. नियमित जांच डॉक्टर से जांच करवाना भी बेहद जरूरी है जिस से की किसी जटिलता को रोका जा सके। 3. योग और तनाव प्रबंधन योग, ध्यान और व्यायाम करने से तनाव को कण्ट्रोल करने में मदद मिलती है।  ४) एक्यूट पैंक्रियास के रोकथाम के उपाय? एक्यूट पैंक्रियास को रोखने के लिए निचे बताये गए उपाय है ,जैसे की , - शराब को कभी भी नहीं पीना चाहिये। - संतुलित आहार का उपयोग करना भी अच्छा है। - वजन को कण्ट्रोल में करना - समय-समय पर पेट की जांच करवाएं।  यदि डायबिटीज या हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो तो उसे नियंत्रण में रखें।
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kidney me pathri kyu banti hai
१) किडनी स्टोन क्या है ? किडनी स्टोन सामान्य पर अत्यंत ही दर्दनाक बीमारी है, जो तब होता है जब खनिज और लवण मूत्र में इकट्ठा होकर छोटे-छोटे पत्थरों के रूप ले लेते हैं। जो की पत्थर मूत्रनली में फंस जाने से तेज़ दर्द, पेशाब में जलन , और संक्रमण जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। यदि समय पर इसका इलाज न किया जाए तो यह किडनी को भी नुकसान कर सकती है। २) किडनी स्टोन बनने के क्या कारण होते है ? किडनी में स्टोन बनने के कारण निचे अनुसार होते है, जैसे की , - कम पानी पीना का उपयोग : शरीर में तरल की कमी हो जाने से मूत्र गाढ़ा हो जाता है, जिस से खनिज जमा होने लगते हैं। - ज्यादा नमक और प्रोटीन का सेवन : ज्यादा नमक और जानवरों से मिलने वाले प्रोटीन यूरिक एसिड और कैल्शियम की मात्रा को बढ़ाता है। - अगर परिवार में किसी को भी पथरी होती है तो जोखिम का ख़तरा और भी बढ़ जाता है। - अनियमित खानपान  ३) किडनी स्टोन होने पर क्या लक्षण दिखाई देते है? किडनी स्टोन होने पर निचे अनुसार लक्षण दिखाई देते है जैसे की , - कमर, पेट या पीठ में तेज़ दर्द -पेशाब करते समय ज्यादा जलन या दर्द का होना  - पेशाब में से खून का आना - मतली और उल्टी - बार-बार पेशाब का आना, पर पेशाब कम होना  ४) किडनी स्टोन का इलाज? 1. छोटी पथरी होने पर : -अधिक पानी पीने से छोटी पथरी मूत्र के साथ ही बाहर निकल जाती है। - नींबू और बेकिंग सोडा : नींबू में साइट्रिक एसिड होने से जो पथरी को घोलने में मदद करता है। पर डॉक्टर की सलाह पर से ही लें।  2. दवाइयों से उपचार पेनकिलर्स : दर्द को कम करने के लिए - यदि संक्रमण हो एंटीबायोटिक्स का उपयोग ५) किडनी स्टोन से बचाव के क्या उपाय है ? - उचित मात्रा में पानी पिएं  - नमक और रेड मीट का सेवन को कम करें। - खट्टे फलों का सेवन करें जैसे की , नींबू, संतरा, जिससे की साइट्रेट बढ़े और पथरी न बने। -वजन को नियंत्रित रखें और डेली व्यायाम करें।  -चाय, कोल्ड ड्रिंक को सीमित करें।
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kidney failure ka homeopathy me upchaar
किडनी फेलियर होने का होमियोपैथी में इलाज गुर्दे हमारे शरीर के महत्वपूर्ण भाग में से एक हैं जो, की खून को साफ करने में , अपशिष्ट निकालने और शरीर के तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने का काम करते हैं। - जब किडनी 90% से अधिक कार्य करने की क्षमता खो देती हैं, तो उसे किडनी फेलियर (Kidney Failure) कहा जाता है। यह स्थिति गंभीर होती है और इसके उपचार के लिए उचित समय पर उचित डॉक्टर की आवश्यकता होती है। १) किडनी फेलियर होने के प्रमुख कारण क्या होते है ? किडनी फेल होने के प्रमुख कारण निचे बताये अनुसार हो सकते है , जैसे की ,  - मधुमेह : लंबे समय तक अनियंत्रित शुगर स्तर किडनी की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुँचा सकता है। - उच्च रक्तचाप : उच्च दबाव किडनी की रक्त आपूर्ति को असर करता है। - बार-बार पेशाब में संक्रमण : लंबे समय तक संक्रमण होने से किडनी खराब हो सकती है।  २) किडनी फेलियर के क्या-क्या लक्षण दिखाई देते है? किडनी फेलियर के लक्षण निचे अनुसार हो सकते है ,जैसे की , -अत्यधिक थकान और कमजोरी लगना  -बार-बार उल्टी का होना या मतली  - भूख में कमी होना - पैरों, टखनों या चेहरे पर सूजन का आ जाना  - सांस लेने में भी दिक्कत होना  - पेशाब की मात्रा में बदलाव ३) किडनी फेलियर के कितने प्रकार होते है ? किडनी फेलियर के २ प्रकार होते है जैसे की ,  १) एक्यूट किडनी फेलियर : अचानक से ही किडनी का कार्य करना बंद कर देना। सही समय पर इलाज से यह ठीक हो सकता है।  २) क्रॉनिक किडनी फेलियर: धीमे-धीमे किडनी की कार्य करने की क्षमता कम होती जाती है और यह स्थायी रूप से नुकसान देह होती है।  ४) किडनी फेलियर इलाज के क्या विकल्प है ? * डायलिसिस *  डायलिसिस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मशीन के जरिये से खून में से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त पानी को निकालना होता है। इसके दो प्रकार हैं:  - हेमोडायलिसिस : सप्ताह में 2 बार मशीन से रक्त को साफ किया जाता है। - पेरिटोनियल डायलिसिस: पेट की परत का उपयोग कर के अपशिष्ट निकाला जाता है।  * किडनी ट्रांसप्लांट *  जब भी किडनी पूरी तरह से फेल हो जाती है, और डायलिसिस से आराम नहीं मिलती , तब किडनी प्रत्यारोपण एक स्थायी विकल्प होता है। - इसमें मरीज को एक अच्छे किडनी दानदाता से किडनी मिलती है, जिससे उसका जीवन फिर से सामान्य हो सकता है। * दवाइयां और आहार प्रबंधन * - उच्च रक्तचाप और मधुमेह को कण्ट्रोल करने की दवाइयाँ - कम प्रोटीन और कम नमक , कम पोटेशियम वाला आहार  - पानी की मात्रा कण्ट्रोल
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chronic calcific pancreatitis treatment in homeopathy
१) क्रोनिक कैल्सिफिक पैंक्रियाटाइटिस क्या है? इस प्रकार के क्रोनिक पैंक्रियाटाइटिस है, जिसमें लंबे समय तक सूजन बनी रहने से पैंक्रियास में कैल्शियम के कण बनने लग जाते हैं। ये कण पैंक्रियास की नली को ब्लॉक कर देते हैं, जिससे पाचन एंजाइम्स का बहाव बाधित होता है। इससे न सिर्फ पाचन खराब होता है, बल्कि (diabetes) जैसी जटिलताएं भी हो सकती हैं। २) क्रोनिक कैल्सिफिक पैंक्रियाटाइटिस मुख्य कारण क्या है? -ज्यादा मात्रा में शराब का सेवन (सबसे सामान्य कारण) -आनुवंशिक या पारिवारिक कारण  -कुपोषण या अधिक वसा युक्त भोजन -ऑटोइम्यून बीमारियां  -ट्रॉपिकल पैंक्रियाटाइटिस (भारत और दक्षिण एशिया में आम) ३) क्रोनिक कैल्सिफिक पैंक्रियाटाइटिस के प्रमुख लक्षण कौन -कौन से है ? -ऊपरी पेट में लगातार या रुक-रुक कर तेज दर्द  -वजन घटना  -भोजन के बाद दर्द बढ़ना-पाचन संबंधी समस्याएं (डायरिया, फैटी स्टूल्स) मधुमेह के लक्षण – प्यास, पेशाब, थकान पेट फूलना या गैस बनना ४) निदान (Diagnosis)? -सोनोग्राफी या सीटी स्कैन: पैंक्रियास में कैल्शियम जमा होने की पुष्टि -एमआरसीपी / ईआरसीपी: पैंक्रियास की नलियों का दृश्य  -ब्लड टेस्ट: लिपेज, एमाइलेज, शुगर लेवल -स्टूल टेस्ट: वसा की मात्रा का परीक्षण  एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड (EUS): उच्च संवेदनशीलता वाला टेस्ट ५) उपचार (Treatment) क्रोनिक कैल्सिफिक पैंक्रियाटाइटिस का इलाज लंबी अवधि के लिए किया जाता है और इसका उद्देश्य दर्द को नियंत्रित करना, पाचन में सुधार लाना और मधुमेह जैसी जटिलताओं से बचाना होता है। 1. दवा से उपचार ✅ दर्द नियंत्रक दवाएं: पेरासिटामोल या ट्रामाडोल  कुछ मामलों में ओपिओइड (नियंत्रित मात्रा में) ✅ एंजाइम सप्लीमेंट: -पैंक्रियाटिक एंजाइम कैप्सूल  यह भोजन के पाचन में मदद करते हैं और वजन घटने से बचाते हैं। ✅ इंसुलिन या डायबिटीज की दवाएं: -यदि पैंक्रियास इंसुलिन बनाना बंद कर देता है, तो मरीज को मधुमेह हो जाता है।  2. आहार और जीवनशैली ✅ आहार में बदलाव: - कम वसा वाला आहार - बार-बार थोड़े-थोड़े भोजन लेना - शराब और धूम्रपान से पूरी तरह परहेज - पर्याप्त पानी पीना  ✅ पोषण सलाह: -मल्टीविटामिन सप्लीमेंट -प्रोटीन युक्त संतुलित आहार 3. एंडोस्कोपिक या सर्जिकल उपचार -अगर दर्द बहुत अधिक हो या पैंक्रियास की नलियों में रुकावट हो तो: ✅ एंडोस्कोपिक उपचार: -पैंक्रियाटिक डक्ट में स्टेंट डालना - पथरी निकालना (ERCP द्वारा)  ✅ सर्जरी: - पैंक्रियास की रुकावट को हटाना - कुछ मामलों में आंशिक पैंक्रियाटेक्टॉमी
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homeopathy treatment for wilson disease
1) विल्सन रोग क्या है? कॉपर एक आवश्यक खनिज है जो हमारे शरीर में कई जैविक प्रक्रियाओं के लिए जरूरी होता है। आमतौर पर शरीर इस तांबे का उपयोग करके अतिरिक्त मात्रा को मूत्र के माध्यम से बाहर निकाल देता है। लेकिन विल्सन रोग में ATP7B नामक एक जीन में विकृति (mutation) के कारण शरीर कॉपर को सही तरीके से बाहर नहीं निकाल पाता। परिणामस्वरूप यह लीवर और अन्य अंगों में इकट्ठा होने लगता है और धीरे-धीरे अंगों की कार्यप्रणाली को बिगाड़ देता है। 2) यह रोग कैसे होता है? विल्सन रोग एक ऑटोसोमल रिसेसिव आनुवंशिक रोग है। इसका मतलब है कि यदि किसी व्यक्ति को यह बीमारी होती है तो उसे माता और पिता दोनों से दोषपूर्ण जीन प्राप्त हुआ होता है। यदि केवल एक माता-पिता से दोषपूर्ण जीन प्राप्त होता है, तो व्यक्ति रोगवाहक (carrier) बनता है, लेकिन उसे खुद बीमारी नहीं होती। 3) विल्सन रोग के लक्षण? विल्सन रोग के लक्षण व्यक्ति की उम्र और अंगों के प्रभावित होने पर निर्भर करते हैं। इसके लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं और शुरुआत में पहचानना मुश्किल हो सकता है। * 1. यकृत (लीवर) से जुड़े लक्षण: -थकान और कमजोरी  -पेट में सूजन या दर्द पीलिया (त्वचा और आंखों का पीला होना)  -लिवर सिरोसिस या लीवर फेलियर * 2. न्यूरोलॉजिकल और मानसिक लक्षण: -कंपकंपी या हाथों का थरथराना -चलने में असंतुलन -बोलने या निगलने में कठिनाई -व्यवहार में बदलाव -अवसाद, चिड़चिड़ापन, या मनोविकृति  * 3. आंखों में परिवर्तन: -Kayser-Fleischer rings : आंखों की कॉर्निया में तांबे के जमाव से बनी हरी-भूरी रिंग 3) निदान (Diagnosis) विल्सन रोग का निदान कुछ विशेष जांचों द्वारा किया जाता है:  -ब्लड टेस्ट: सीरुलोप्लाज्मिन (ceruloplasmin) नामक प्रोटीन का स्तर  -यूरीन टेस्ट: 24 घंटे में मूत्र में कॉपर की मात्रा  -लीवर बायोप्सी: लीवर में कॉपर की पुष्टि  -आई एग्जामिनेशन: Kayser-Fleischer रिंग्स की जांच - - जेनेटिक टेस्ट: ATP7B जीन म्यूटेशन की पुष्टि 4) उपचार (Treatment) विल्सन रोग का इलाज जीवनभर चलता है, लेकिन समय पर शुरू हो जाए तो व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। * प्रमुख उपचार: -कॉपर-चेलेटिंग एजेंट्स:  जो शरीर से अतिरिक्त कॉपर बाहर निकालते हैं  -जिंक सप्लीमेंट्स: तांबे के अवशोषण को रोकते हैं  -लो कॉपर डाइट: जैसे नट्स, चॉकलेट, समुद्री भोजन से परहेज -लिवर ट्रांसप्लांट: गंभीर लिवर डैमेज की स्थिति में 5) रोकथाम और जागरूकता चूंकि यह एक आनुवंशिक बीमारी है, इसलिए इसका कोई निश्चित रोकथाम नहीं है। लेकिन यदि किसी परिवार में यह बीमारी है, तो अन्य सदस्यों का जेनेटिक टेस्ट करवाना जरूरी है ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके। निष्कर्ष विल्सन रोग एक लाइलाज नहीं, बल्कि एक नियंत्रित करने योग्य बीमारी है। समय पर सही पहचान और नियमित इलाज से रोगी लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जी सकता है। यदि परिवार में कोई लक्षण दिखाई दे या पुराना लिवर या न्यूरोलॉजिकल रोग हो, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
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urethral stricture treatment in homeopathy
१) यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर क्या है? यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर एक आम लेकिन जटिल मूत्रमार्ग संबंधी रोग है, जिसमें यूरेथ्रा (मूत्रमार्ग) संकुचित हो जाती है। इससे पेशाब का प्रवाह भी बाधित होता है और रोगी को कई बार पेशाब में जलन होना , या रुकावट जैसी परेशानियाँ को झेलनी पड़ती हैं। - यह पुरुषों में महिलाओं की तुलना में बहुत ही ज्यादा होता है, क्योंकि पुरुषों की यूरेथ्रा लंबी होती है। -यह रोग समय पर इलाज न होने पर (किडनी) और मूत्राशय को नुकसान भी पहुंचा सकती है, इसलिए इसका समय पर निदान और उपचार बेहद ज़रूरी है। २) यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर के क्या क्या कारण होते है ? यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर के कारन निचे बताये अनुसार हो सकते है - जैसे की  - चोट या आघात: पेल्विस पर लगी चोट, दुर्घटना या गिरने से - पूर्व सर्जरी या कैथेटर का बार-बार उपयोग - संक्रमण : जैसे गोनोरिया या क्लैमाइडिया  - मूत्र में बार-बार इन्फेक्शन होना ३ ) यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर के क्या क्या लक्षण होते है ? यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर के लक्षण निचे अनुसार होते है , -पेशाब करने में कठिनाई -पतली या धीमी पेशाब की धार  -बार-बार पेशाब लगना -मूत्राशय पूरी तरह खाली न हो पाना -पेशाब के बाद जलन या दर्द -पेशाब में रक्त आना  अगर समय पर इलाज न किया जाए, तो गुर्दे में सूजन (Hydronephrosis), बार-बार संक्रमण, या यहां तक कि किडनी फेलियर तक हो सकता है। ४ ) निदान (Diagnosis) -यूरेथ्रोग्राफी (RUG) – मूत्रमार्ग की एक्स-रे जांच -सिस्टोस्कोपी – एंडोस्कोप द्वारा मूत्रमार्ग का निरीक्षण -अल्ट्रासाउंड – मूत्राशय और किडनी की स्थिति जानने के लिए  -यूरीन टेस्ट – संक्रमण का पता लगाने के लिए  -फ्लो मीट्री – पेशाब के प्रवाह की गति मापना ५) उपचार (Treatment) यूरेथ्रल स्ट्रिक्चर का उपचार उसकी गंभीरता, लम्बाई और स्थान के अनुसार तय किया जाता है। नीचे प्रमुख उपचार विकल्प दिए गए हैं: 1. यूरेथ्रल डाइलेशन (Urethral Dilation) यह एक सरल प्रक्रिया है जिसमें विशेष उपकरणों (Dilators) की मदद से संकरी हुई मूत्रनली को धीरे-धीरे चौड़ा किया जाता है।  - कब उपयोगी: प्रारंभिक अवस्था जब स्ट्रिक्चर छोटा हो  2. इंडोस्कोपिक यूरोथ्रोटॉमी (VIU – Visual Internal Urethrotomy) इस प्रक्रिया में कैमरे द्वारा मूत्रमार्ग के अंदर जाकर संकरी जगह को चीरा लगाकर खोला जाता है।  कब उपयोगी: स्ट्रिक्चर छोटा (1 से 2 सेमी तक) हो लाभ : सामान्य एनेस्थीसिया में होती है - कुछ घंटों में घर भेजा जा सकता है नुकसान: कई मामलों में दोबारा होने की संभावना रहती है  3 . कैथेटर थैरेपी और स्टेंटिंग कुछ मामलों में मूत्र प्रवाह को बनाए रखने के लिए कैथेटर या स्टेंट का अस्थायी प्रयोग किया जाता है। * जीवनशैली और सावधानियाँ* -पेशाब को रोके नहीं - पर्याप्त पानी पिएं - यौन संबंधों में सुरक्षा बरतें
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acute necrotizing pancreatic ka homeopathy me ilaaj
एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस : कारण, लक्षण और उपचार एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस (Acute Necrotizing Pancreatitis) अग्न्याशय (Pancreas) की एक गंभीर और जानलेवा स्थिति होती है, जिसमें पैंक्रियास की कोशिकाएं नष्ट (Necrosis) होने लगती हैं। यह स्थिति आमतौर पर तीव्र पैंक्रियाटाइटिस के जटिल रूप में विकसित होती है। इसका समय पर और सही इलाज न होने पर संक्रमण, अंग विफलता और मृत्यु तक हो सकती है। १) एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस के होने के क्या कारण है? एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस के मुख्य कारणों में शामिल हैं: जैसे की - पित्ताशय की पथरी : – यह पैंक्रियास की नली को अवरुद्ध कर के सूजन और नेक्रोसिस का कारण बनता है।  - अत्यधिक शराब का सेवन  - उच्च ट्राइग्लिसराइड स्तर  - कुछ दवा का साइड इफेक्ट का होना -वायरल संक्रमण २ ) एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस होने के क्या लक्षण दिखाई देते है ? इस बीमारी के लक्षण निचे बताये गए अनुसार हो सकते है , जैसे की ,  - पेट के ऊपरी भाग में तेज दर्द का होना - उल्टी और मतली  - तेज धड़कन और बुखार -पेट में सूजन का आ जाना - शरीर में कमजोरी सा लगना  - पेशाब में बदलाव  - सांस लेने में परेशानी ३) एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस उपचार क्या है ? 1. अस्पताल में भर्ती या निगरानी : मरीज को ICU में एडमिट किया जाता है। और निगरानी के लिए खून का टेस्ट, CT स्कैन , अल्ट्रासाउंड जाँच भी किए जाते हैं। 2. IV Fluids और पोषण: - डिहाइड्रेशन न हो और उस से बचाने के लिए IV फ्लूइड्स दिया जाता है।  - खाने-पीने से कुछ दिन तक परहेज कर के शरीर को आराम दिया जाना भी जरुरी होता है।  3. बुखार और दर्द का इलाज: बुखार और संक्रमण को कम करने या रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स भी दिए जाते हैं। ४) एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस होने पर क्या देखभाल होनी चाहिए ? - उबली हुई और कम मसाले वाली चीजें को खाना चाहिए। - धीरे-धीरे लिक्विड डाइट शुरू करें और डॉक्टर के सलाह पर ही ठोस खाना शुरू करें। - शराब और तले-भुने भोजन से पूरी तरह दुरी बनाये रखना चाहिए। ५) एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस से बचाव के लिए क्या करना चाहिए ? - समय - समय पर गॉलब्लैडर की पथरी का इलाज करवाए - शराब से दुरी बनाये रखें।  -संतुलित और कम फैट वाली डाइट लें।
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ca 19 9 kya hai
CA 19-9 क्या है और इसके बढ़ने से कैंसर का खतरा क्यों हो सकता है? CA 19-9 (Cancer Antigen 19-9) एक प्रकार का प्रोटीन है, जिसे ट्यूमर मार्कर कहा जाता है। यह शरीर में उन कोशिकाओं द्वारा उत्पादित होता है, जो असामान्य रूप से बढ़ जाती हैं। सामान्यतः, यह प्रोटीन पाचन तंत्र के कुछ अंगों जैसे पैंक्रियाज, जिगर, गल मार्ग, और आंतों में पाया जाता है। जब इन अंगों में कैंसर होता है, तो CA 19-9 का स्तर शरीर में बढ़ सकता है। यह मार्कर विशेष रूप से पैंक्रियाटिक कैंसर, कोलोन कैंसर, लिवर कैंसर, औरGall bladder (पित्ताशय की थैली) के कैंसर के साथ जुड़ा हुआ है। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि CA 19-9 का स्तर बढ़ने का मतलब हमेशा कैंसर ही हो, क्योंकि कई बार यह संक्रमण, सूजन, या अन्य गैर-कैंसर बीमारियों में भी बढ़ सकता है।  CA 19-9 का परीक्षण क्यों किया जाता है? डॉक्टर इस परीक्षण का उपयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए करते हैं: - **कैंसर का निदान:** कोई मरीज के लक्षण यदि कैंसर से मिलते-जुलते हैं, तो CA 19. 9 का जाँच कर पता लगाया जा सकता है कि मरीज को कैंसर या नहीं है।  - **कैंसर का प्रगति ट्रैकिंग:** यदि पहले से कैंसर का निदान हो चुका है, तो इस मार्कर का स्तर उसकी प्रगति या उपचार की प्रतिक्रिया को समझने में मदद करता है।  - **रिसिडिव (पुनः उत्पन्न) कैंसर की जांच:** इलाज के बाद यदि CA 19-9 का स्तर फिर से बढ़ता है, तो इसका मतलब हो सकता है कि कैंसर वापस आ गया है। CA 19-9 का स्तर कितना होना चाहिए? CA 19-9 का नार्मल लेवल 37 Units per milliliter से नीचे माना जाता है। पर ये लेवल अगर ज्यादा बढ़ जाये तो ,कैंसर या कोई अन्य स्थिति भी हो सकती है।  - **उच्च स्तर:** कैंसर, सूजन, संक्रमण, या जिगर की बीमारी का संकेत हो सकता है। - **बहुत अधिक स्तर:** यह अधिक गंभीर कैंसर के हो सकते हैं, जैसे कि पैंक्रियाटिक कैंसर, विशेष रूप से जब यह बढ़ जाता है।  क्या CA 19-9 का स्तर बढ़ने का मतलब हमेशा कैंसर ही है? - उत्तर है, नहीं। यह कोई निश्चित निदान नहीं है। कई गैर-कैंसर स्थितियों में भी इसकी मात्रा बढ़ भी सकती है, जैसे: - पैंक्रियाटिक सूजन (पैंक्रियाटाइटिस) - जिगर की बीमारियाँ (जैसे हेपेटाइटिस) - Gallstones (पित्ताशय की पथरी) - संक्रमण या सूजन इसलिए, यदि CA 19-9 का स्तर बढ़ता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति के पास कैंसर है। यह केवल एक संकेत है, जिसके बाद और जांचें की जाती हैं, जैसे कि इमेजिंग (अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, MRI) और बायोप्सी, ताकि सही निदान किया जा सके। CA 19-9 का उपयोग सीमित क्यों है? क्योंकि बहुत से गैर-कैंसर मामलों में भी CA 19-9 का स्तर बढ़ सकता है, इसलिए यह मार्कर केवल एक सहायता उपकरण है, न कि अंतिम निदान। इसका प्रयोग मुख्य रूप से कैंसर का अनुमान लगाने, उसकी प्रगति का मूल्यांकन करने, और उपचार की प्रतिक्रिया देखने के लिए किया जाता है। निष्कर्ष - CA 19-9 एक ट्यूमर मार्कर है, जो मुख्य रूप से पैंक्रियाटिक और अन्य संबंधित अंगों के कैंसर की पहचान में मदद करता है।** - **इसके स्तर का बढ़ना जरूरी नहीं कि कैंसर ही हो, बल्कि यह संक्रमण, सूजन, या जिगर की बीमारियों का भी संकेत हो सकता है।** - यह मार्कर केवल निदान में मदद करता है, अंतिम पुष्टि के लिए अन्य टेस्ट जरूरी होते हैं।**
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acute necrotizing pancreatitis ka homeopathic me ilaaj
१)एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियास होने के क्या कारण होते है ? एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियास होता है जब हमारे शरीर अग्न्याशय में सूजन या चोट लगती है, और अग्नाशयी एंजाइम लीक होने लग जाते हैं। यह अग्न्याशय के ऊतक को नुकसान पहुंचाते है। इस क्षति को उलटा नहीं किया जा सकता है, तो यह नेक्रोटाइज़िंग पैन्क्रियाटाइटिस का कारण बनते है। कुछ मामलों में, ऊतक संक्रमित हो सकते हैं। यह बैक्टीरिया से होता है जो की मृत ऊतक में फैल जाते हैं। ** एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियास होने का कारण इस प्रकार से होता है जैसे की , - जयदा दवा का उपयोग करना  - खून में कैल्सियम का स्तर ज्यादा होना , - पित्ताशय की पथरी होना , - बहुत ज़्यादा शराब पीना २) एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियास का खतरा किसे होता है? आपको कोई स्वास्थ्य की समस्या है जो की अग्नाशयशोथ का कारण बन सकती है, तो आपको एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियाटाइटिस का जोखिम अधिक हो सकता है। इसमें पित्त पथरी शामिल है। आप अपनी स्वास्थ्य स्थिति का इलाज करके एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियाटाइटिस के जोखिम को कम भी कर सकते हैं। जिसमे कम शराब पीने से भी आपका जोखिम कम हो सकता है। 3) एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियास में वजन नही बढ़ने का क्या कारण है ? एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैन्क्रियाटाइटिस में वजन न बढ़ने का कारण निचे अनुसार हो सकते है ,जैसे की , -पाचन की कमी होने से  -संक्रमण और सूजन का होना  -पोषण की कमी -विटामिन की कमी ४) एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियास होने पर क्या लक्षण होते है? एक्यूट नेक्रोटाइज़िंग पैंक्रियास होने के लक्षण निचे बताया गया है ,जो की इस प्रकार से है ,  - पेट के ऊपरी भाग में दर्द होता है और यह दर्द धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। - पेट का ऊपरी हिस्सा सूजा हुआ लगना  -मतली और उल्टी का होना - हृदय की गति का तेज हो जाना
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vocal cord polyp ka homeopathy me ilaaj
१) वोकल कॉर्ड पोलिप रोग क्या होता है?वोकल कॉर्ड पोलिप ये ज्यादा बोलने वाले ,या चिल्लाने वाले , धूम्रपान, एलर्जी, या गले के संक्रमण होने के कारण से ये प्रॉब्लम हो सकती है। २) वोकल कॉर्ड पोलिप होने के क्या लक्षण दिखाई देते है ? वोकल कॉर्ड पोलिप होने के लक्षण निचे बताये अनुसार हो सकते है , जैसे की , - आवाज़ का भारी हो जाना  - गले में खिंचाव जैसे लगना -खांसी का लगातार आना  - बोलने में ज्यादा परेशानी का होना  - कभी -कभी पूरी तरह से आवाज़ का बैठ जाना  ३) होम्योपैथी में वोकल कॉर्ड पोलिप का क्या इलाज है ? - होम्योपैथी दवा बीमारी को जड़ से ख़त्म करने पर काम करती है। यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और प्रतिरक्षा प्रणाली" को भी मजबुत बनती है ,  * लाभ *  - होमियोपैथी में सर्जरी की जरुरत नहीं होती है ,  - होमियोपैथी की दवा कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है - दीर्घकालिक समय के लिए आराम हो जाता है।  ४) वोकल कॉर्ड पोलिप पर जीवनशैली और घरेलू सुझाव क्या है ? - बोलने की आदत में सुधार : ज्यादा ऊँची आवाज़ में बोलना और लगातार बोलने में कमी करना  - धूम्रपान से दुरी रखना - शराब से भी दूर होना चाहिए - गर्म पानी से गरारे करें, दिन में अधिक पानी पिएं। - ज्यादा मसालेदार, खट्टे और ज्यादा ऑयली भोजन से बचना ५) होम्योपैथिक इलाज की अवधि कितनी होती है ? मरीज के इलाज की अवधि रोग की गंभीरता, और प्रतिरोधक क्षमता और जीवनशैली पर निर्भर करती है। कुछ लोगों को 2-3 महीनों में भी सुधार मिल जाता है, वहीं कुछ मामलों में 6 महीने या उससे अधिक का भी समय लग सकता हैं।
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acute pancreatitis ke bimari se mila aaram
१)एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस क्या है? एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस गंभीर और अचानक से उत्पन्न होने वाली स्थिति है जिसमें अग्न्याशयमें सूजन आ जाती है। -अग्न्याशय ये हमारे शरीर एक महत्वपूर्ण भाग है ,जो की पाचन एंजाइम और इंसुलिन जैसे हार्मोन का उत्पादन करता है।  -ये ग्रंथि जब सूज जाती है, तो यह एंजाइम अपने ही ऊतकों को पचाने लगते हैं, जिससे तेज़ दर्द और अन्य जटिलताएं हो सकती हैं।    २) एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस होने के कारण क्या हो सकते है ? एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस होने के कारण निचे बताये अनुसार है , - पित्ताशय की पथरी : ये अग्न्याशय की नलिका को ब्लॉक करने से एंजाइम का प्रवाह बाधित होता है और इसमें सूजन होती है। -लंबे समय तक ज्यादा शराब पिने से भी अग्न्याशय को नुकसान पहुंचता है - ऊंचे ट्राइग्लिसराइड्स स्तर: जब खून में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अधिक होता है, तो यह अग्न्याशय को नुकसान करता है - कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट्स से भी पैंक्रियाटाइटिस हो सकता है। - जनेटिक या ऑटोइम्यून कारण: कुछ लोगों में पारिवारिक आनुवांशिक के कारण से भी समस्याएं होती है।    ३) एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस होने के क्या लक्षण होते है ? निचे बताये अनुसार इसके लक्षण होते है , जैसे की - पेट में अचानक और तेज़ दर्द दर्द का होना  - मिचली और उल्टी - बुखार  - पेट में गैस बनना - खाना सही से न पचना  ४) एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस के निदान कैसे होते है ? एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस की पहचान निम्नलिखित तरीकों से की जाती है:  - रक्त परीक्षण :Amylase और Lipase नामक एंजाइम्स का स्तर उच्च होता है।  - अल्ट्रासाउंड या CT स्कैन से अग्न्याशय की सूजन, या पथरी का पता लगाने में मदद करती हैं।  - MRI या एंडोस्कोपी (ERCP): विशेष मामलों में गहन जांच के लिए उपयोग किया जाता है।  ५) एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस के रोकथाम क्या है ? - शराब का सेवन से पूरी तरह दुरी रखना। - कम चर्बी वाला आहार लेना  - पित्ताशय की पथरी से बचने के लिए वजन को कण्ट्रोल में रखना - डेली व्यायाम करें - डॉक्टर की सलाह से ही दवा का उपयोग करना
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Adenomyosis ke saath me pregnancy possible hai
१) एडेनोमायोसिस क्या है? ये स्त्री रोग से संबंधी बीमारी की स्थिति है, जिसमें गर्भाशय की अंदर की परत की कोशिकाएं गर्भाशय की मांसपेशियों में बढ़ने लग जाती हैं। आमतौर पर 25 से 45 उम्र की महिलाओं में देखने को मिलती है और इसके लक्षणों में भारी मासिक धर्म, गंभीर पेट दर्द, सूजन और थकान हो सकते हैं। २ ) एडेनोमायोसिस और फर्टिलिटी के बीच संबंध? ये महिला की प्रजनन क्षमता को असर कर सकता है। यह स्थिति गर्भाशय की संरचना को बदल भी सकती है, जिससे की शुक्राणु और अंडाणु के मिलने की प्रक्रिया, भ्रूण का प्रत्यारोपण (implantation) और गर्भावस्था को बनाए रखने में परेशानी हो सकती है। इसके कारण गर्भधारण में देरी या बार-बार गर्भपात की संभावना बढ़ सकती है। ३) एडेनोमायोसिस के प्रमुख कारण क्या होते है ? एडेनोमायोसिस के प्रमुख कारण निचे बताया गया है ,जो की इस प्रकार से है - गर्भाशय की दीवार असमान का होना - गर्भाशय में सूजन और छोटे घाव  - हार्मोनल का असंतुलन होना  - रक्त के प्रवाह में भी रुकावट     ४) क्या Adenomyosis के साथ प्रेग्नेंसी संभव है? हां, Adenomyosis के साथ प्रेग्नेंसी संभव है, पर Adenomyosis फर्टिलिटी को असर कर सकता है, ये जरूरी नहीं है कि , हर महिला को गर्भधारण में समस्या आए। कई महिलाएं इस स्थिति के बाद में भी गर्भवती हो जाती हैं।  कुछ में IVF की जरुरत हो सकती है.५) adenomyosis के कारण गर्भधारण में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर क्या उपचार करते है ? - 1. हार्मोनल का उपचार: जो अस्थायी रूप से हार्मोन का स्तर घटाकर गर्भाशय को "आराम" देते हैं। इससे गर्भावस्था के लिए उपयुक्त स्थिति बनाई जा सकती है। 2. IVF जिन महिलाओं में कुछ प्रयासों से गर्भधारण नहीं हो रहा है, उनके लिए IVF एक विकल्प है , IVF के साथ प्रेग्नेंसी की संभावना adenomyosis की गंभीरता पर निर्भर करती है।  3. सर्जरी (अगर ज्यादा गंभीर हो) कुछ मामलों में adenomyosis को हटाने के लिए सर्जरी की जरुरत होती है, जिसे adenomyomectomy कहते हैं।    ६) प्रेग्नेंसी के दौरान क्या सावधानियां रखना चाहिए? Adenomyosis के साथ गर्भवती महिला को ज्यादा सावधानियां की आवश्यकता होती है: - डेली अल्ट्रासाउंड और डॉक्टर की निगरानी में  - समय-समय पर खून की टेस्ट  - डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाओं और सप्लीमेंट्स का सेवन  सफल प्रेग्नेंसी की कहानियां कई महिलाएं जो adenomyosis से पीड़ित थीं, उन्होंने उचित इलाज, IVF या नेचुरल प्रयासों से सफलतापूर्वक प्रेग्नेंसी प्राप्त की है। डॉक्टर की सलाह और सही उपचार योजना इस स्थिति में सबसे बड़ी मदद होती है।
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gastritis treatment homeopathic
१) गैस्ट्राइटिस का क्या इलाज है ? गैस्ट्राइटिस का अर्थ है की आमाशय की सूजन। सामान्य पाचन तंत्र की समस्या है, जो की अमाशय की परत में जलन या सूजन के कारण से होती है। यह समस्या कम भी हो सकती है और ज्यादा गंभीर भी, जो आगे चलकर अल्सर या अन्य जटिलताओं का कारण बनती है। इसके कारण, लक्षण और इलाज को समझना आवश्यक है ताकि समय पर उचित कदम उठाए जा सकें। २) गैस्ट्राइटिस होने के क्या कारण है? गैस्ट्राइटिस कई कारणों से हो सकता है, जैसे की ,  - अनियमित खानपान : बहुत अधिक तीखा खाना ,या मसालेदार , तला हुआ भोजन। - ज्यादा शराब का उपयोग करना  - धूम्रपान  -ज्यादा पेनकिलर दवाइयों का सेवन करना - बैक्टीरिया का संक्रमण -मानसिक चिंता ३) गैस्ट्राइटिस होने के क्या लक्षण होते है ? गैस्ट्राइटिस के सामान्य लक्षणों है, जो की इस प्रकार से है , - पेट में जलन या पेट में दर्द का होना - अपच  - उल्टी या मतली  - भूख में कमी लगना -पेट का फूल जाना  ४) गैस्ट्राइटिस का घरेलू इलाज क्या है ? * सादा और हल्का भोजन : दलिया, उबली सब्जि, दही आदि का सेवन करें। ज्यादा मसालेदार और तले हुए भोजन से दुरी रखना।  * अदरक और शहद : अदरक में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। एक चम्मच अदरक का रस और आधा चम्मच शहद मिलाकर दिन में दो बार सेवन करें। * तुलसी के पत्ते : 4-5 तुलसी के पत्ते को चबाना लाभदायक होता है।  * नारियल पानी : अमाशय की पर्त को शांत करता है और हाइड्रेशन बनाए रखता है। * छाछ और सौंफ छाछ में थोड़ा सा सौंफ और काला नमक मिलाकर पिएं, यह गैस में राहत देगा।  ५) गैस्ट्राइटिस में क्या करें और क्या न करें? *गैस्ट्राइटिस में क्या करना चाहिए * - अपने डेली समय पर ही भोजन करना चाहिए। - खूब पानी पीना चाहिए । - तनाव से दुरी रखना चाहिए। - थोड़ा व्यायाम करना चाहिए * गैस्ट्राइटिस में क्या न करें * -  तने ,भुने  मसालेदार भोजन से दूर रहना चाहिए  - चाय, कॉफी और कोल्ड ड्रिंक्स से दुरी रहना  - धूम्रपान से दूर रहे  - शराब  का कम सेवन करना
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homeopathy treatment for gastritis
१) GERD का क्या इलाज है? GERD यह पाचन संबंधी की समस्या है, जिसमें अम्लीय पदार्थ भोजन नली में वापस आ जाता है। यह परीस्थिति अक्सर जलन, सीने में दर्द का होना , खट्टा या कड़वा स्वाद, गले में खराश होना , और खांसी जैसी लक्षणों के रूप में होती है। -यदि इसका समय पर सही इलाज न किया जाए, तो यह जठरांत्र संबंधी जटिलताओं जैसे कि (संकीर्णता) का कारण बन सकती है।  -आज का आर्टिकल में हम GERD का प्रभावी उपचार, जीवनशैली में बदलाव, और घरेलू उपायों पर बात करने वाले है २) GERD होने के क्या कारण हो सकते है ? GERD के कई कारण हो सकते है ,जैसे की १) वजन बढ़ना : ज्यादा वजन होने से पेट पर दबाव आता है, जिससे LES पर दबाव कम हो जाता है और GERD का खतरा बढ़ जाता है. २) कुछ खाद्य और पेय पदार्थ : तले हुए, मसालेदार खाना , चॉकलेट, कॉफी, शराब, लहसुन ये सब GERD के लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं.  ३) ज्यादा भोजन करना या देर रात को भोजन करना : पेट पर दबाव बढ़ जाने से एसिड रिफ्लक्स हो सकता है.  ४) धूम्रपान : धूम्रपान LES को कमजोर कर सकता है और एसिड रिफ्लक्स के जोखिम का खतरा बढ़ा सकता है.  ३) GERD होने के क्या लक्षण है? GERD के कई लक्षण हो सकते है ,जैसे की - सीने में जलन का होना  -मुंह में खट्टा स्वाद का आना -गले में खराश का होना -गले में सूजन - डकार का आना और पाचन में परेशानी ४) GERD का जीवनशैली में परिवर्तन से क्या होता है ? -छोटे और बार-बार भोजन करें : दिन में कई बार हल्का-हल्का भोजन खाएं। -तैलीय, मसालेदार, और तीखे भोजन करने से दुरी बनाये रखे. -कैफीन, चॉकलेट, अदरक, और शराब का सेवन कम होना चाहिए. -धूम्रपान से दुरी रखे. -वजन को नियंत्रित रखें -सोते समय सिर के निचे ऊंचा तकिया रखें.५) GERD के लिए क्या सावधानियां और सुझाव है ? - ज्यादा मसालेदार भोजन खाने से बचें। -खाने के तुरंत बाद सोना नहीं चाहिए  -वजन को नियंत्रित करें। - शराब से दूर रहें। -तनाव को कम करने केलिए , कसरत करना चाहिए  -नियमित रूप से चिकित्सक से जांच कराएं और दवाइयों का सेवन चिकित्सक की सलाह के अनुसार करें।
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mastoiditis ka homeopathic upchar
१) मास्टोइडाइटिस का इलाज क्या है? मास्टोइडाइटिस गंभीर संक्रमण है जो की कान के पीछे स्थित मास्टोइड हड्डी को असर करता है। यह हड्डी छोटे-छोटे वायुवीय कक्षों से बने होते है और इसका सीधा संबंध middle ear से होता है। जब कान का संक्रमण समय रहते ठीक नहीं होता है तो , यह मास्टोइड हड्डी तक फैल सकता है, जिससे मास्टोइडाइटिस होता है। यह स्थिति बच्चों में होती है, पर कोई भी उम्र ये बीमारी हो सकता है। २) मास्टोइडाइटिस के लक्षण क्या है? मास्टोइडाइटिस के लक्षण निचे अनुसार हो सकते है ,जैसे की - कान के पीछे सूजन का होना -लालिमा  -तेजी से सिर में दर्द - कान से मवाद का आना  -सुनने में कमी -बुखार - कान को छूने पर दर्द का तेजी से होना -गर्दन की अकड़न ३) मास्टोइडाइटिस के होने का कारण क्या है? मास्टोइडाइटिस होने का कारण इस प्रकार से है ,  -मध्य कान में संक्रमण : सबसे आम कारण है। पर मध्य कान का संक्रमण सही से इलाज नहीं किया जाये तो संक्रमण मास्टॉयड हड्डी तक फैल सकता है. -कोलेस्टीटोमा : मध्य कान में असामान्य त्वचा में वृद्धि होती है जो कान के अंदर पानी निकलने में असर डालती है और संक्रमण को बढ़ावा देती है, जिससे मास्टोइडाइटिस हो सकता है. -अन्य संक्रमण : मास्टोइडाइटिस मस्तिष्क के फोड़े या अन्य संक्रमण से भी हो सकता है.४) मास्टोइडाइटिस रोकथाम का उपाय क्या है? - कान की साफ-सफाई करना और तैराकी के दौरान सावधानी भी जरूरी है। ताकि पानी कान में न जाये .-शांत करने वाले उपकरणों का उपयोग मध्य कान में संक्रमण का खतरा बढ़ा सकता है. -सर्दी और फ्लू से बचना  -अपने बच्चे को सभी टीकों लगाना चाहिए खासकर न्यूमोकोकल और फ्लू के टीके. -एलर्जी के कारण से सूजन और बलगम हो सकता है उस से दूर रहना चाहिए
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